रविवार, 26 मार्च 2023

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*रात दिवस का रोवणां, पहर पलक का नांहि ।*
*रोवत रोवत मिल गया, दादू साहिब माँहि ॥*
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*साभार : @Subhash Jain*
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*अहोभाव*
नानक बीमार पड़े, चिकित्सक बुलाए गए। नानक की नाड़ी पर चिकित्सक ने हाथ रखा। नानक हंसने लगे। और नानक ने कहा कि देखो नाड़ी, तुम्हारे देखने की इच्छा है तो। और औषधि भी दोगे तो पी लूंगा। मगर यह बीमारी ऐसी है कि इसका कोई इलाज नहीं। तुम्हारे हाथ में नहीं।
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घर के लोग परेशान थे क्योंकि नानक दुबले होते जाते। सोते भी नहीं, ठीक से भोजन भी नहीं करते। न मालूम कौन—सी धुन चढ़ी है ! रात—रात बैठे रोते हैं। एक रात बहुत देर तक रोते रहे। मां ने कहा कि अब सो भी जाओ। रोने से सार क्या है ? 
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लेकिन नानक ने कहा कि जिद बंधी है एक किसी से। सुनती हो ? दूर एक पपीहा कह रहा है: पी कहां ? पी कहां ? इससे जिद बंधी है, कि जब तक यह चुप न होगा, मैं भी चुप नहीं हो सकता। मैं भी अपने प्यारे को पुकार रहा हूं : पी कहां ? और पपीहा नहीं हार रहा है तो मैं हार जाऊं ! इस प्रतियोगिता में मैं हारनेवाला नहीं हूं; रहूं कि जाऊं।
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पी कहां ? प्यारे की खोज पर जो निकला है उसकी जिंदगी यहां तो अस्तव्यस्त होने लगेगी। इस अस्तव्यस्तता को लोग तो यही समझेंगे कि बीमारी है। तुम भी पहले यही समझोगे कि यह क्या हो गया ? भले—चंगे थे, यह सब कैसे बिगड़ गया ? मगर मैं तुम्हें भरोसा दिलाता हूं, यह सुबह की खबर है। मलय—पवन आता है। तुम्हें थोड़े अनुभव से धीरे— धीरे सुवास का पता चलेगा।
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और जल्दी भी मत करो। यह भी मत सोचो कि इतनी देर क्यों हो रही है ? प्रतीक्षा प्रार्थना का प्राण है। और जो इंतजार में आनंदित नहीं है उसके इंतजार में कमी है और उसका इंतजार पूरा नहीं होगा।
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तुझको पा लेने में यह बेताब कैफियत कहां
जिंदगी वो है जो तेरी जुस्तजू में कट गई
पानेवालों ने कहा है कि तुझे पाया, सब ठीक, मगर वह मजा नहीं जो तेरी खोज में था, तेरे इंतजार में था, तेरी प्रतीक्षा में था। वह ललक, वह पुलक ! वे आकांक्षाओं—अभीप्साओं की लपटें।
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तुझको पा लेने में यह बेताब कैफियत कहां
जिंदगी वो है जो तेरी जुस्तजू में कट गई
असली जिंदगी तो तब पता चलती है कि वे जो खोज के दिन थे, बड़े प्यारे थे। मंजिल तो प्यारी है ही, मगर यात्रा भी कुछ कम प्यारी नहीं; शायद ज्यादा ही प्यारी है। क्योंकि उसी यात्रा—पथ से तो हम मंजिल तक पहुंचते हैं।
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जो मंजिल तक ले आती है उसको भी सौभाग्य की तरह स्वीकार करो। यही विरह की अग्नि, यही असह्य पीड़ा तुम्हें मंदिर तक ले आएगी। ये रास्ते के काटे... एक—एक काटा हजार—हजार फूल बनकर खिलेगा। ये रास्ते की मुसीबतें... एक—एक मुसीबत हजार—हजार अमृत के घट बनेगी।
चलते चलो। रोते चलो। पुकारते चलो। हारो मत।
'हारिए न हिम्मत, बिसरिए न राम।'
ओशो

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