रविवार, 26 मार्च 2023

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
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*ऐसो खेल बन्यो मेरी माई,*
*कैसै कहूँ कछु जान्यो न जाई ॥टेक॥*
*सुर नर मुनिजन अचरज आई,*
*राम-चरण को भेद न पाई ॥१॥*
*मंदिर माहिं सुरति समाई,*
*कोऊ है सो देहु दिखाई ॥२॥*
*मनहिं विचार करहु ल्यौ लाई,*
*दिवा समान कहाँ ज्योति छिपाई ॥३॥*
*देह निरंतर शून्य ल्यौ लाई,*
*तहं कौण रमे कौण सूता रे भाई ॥४॥*
*दादू न जाणै ये चतुराई,*
*सोइ गुरु मेरा जिन सुधि पाई ॥५॥*
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*साभार : @Subhash Jain*
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तुम पूछते हो, यह जीवन क्या है ? यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है कि तुमने जीवन को भीतर से जी कर नहीं देखा। बुद्धि में बस, सोच रहे हो कि जीवन क्या है ? जैसे कि कोई उत्तर मिल जाएगा !
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जीवन कोई ऐसी चीज नहीं है कि बुद्धि उत्तर दे दे। जीवन तो जीने में है। जीवन कोई वस्तु नहीं है; इसका विश्लेषण नहीं हो सकता--कि टेबिल पर रख कर और इसका तुम विश्लेषण कर डालो, कि परखनली में रख कर और इसकी जांच-पड़ताल कर लो; कि तराजू पर तौल लो, कि गजों से नाप लो !
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यह जीवन तो तुम्हारे भीतर है। तुम जीवित हो--और पूछते हो, जीवन क्या है ? तुम सुगंधित हो--और पूछते हो सुगंध क्या है ! तुम चैतन्य हो--और पूछते हो: जीवन क्या है ? यही है जीवन--जो तुम हो। पूछते हो, जीवन का सत्य क्या है ? कहां-कहां नहीं खोजा ? खोजते रहो; जनम-जनम से खोज रहे हो। खोज-खोज कर तो खोया है। अब खोज छोड़ो।
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मैं यहां खोज छोड़ना सिखाता हूं। बैठ रहो। मौन हो जाओ। शब्दों में मत तलाशो। शास्त्रों में मत तलाशो। वहां शब्द ही पाओगे। और शब्द सब थोथे हैं। अपने शून्य में विराजो। और उसी शून्य में अविर्भाव होगा।
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और जिसे कहीं नहीं पाया, उसे अपने घर में पाओगे। वह पहले से ही तुम्हारा अतिथि हुआ बैठा है ! अतिथि भी क्यों कहो--अतिथेय है। वही तुम्हारा मालिक है, जिसकी तुम खोज में चले हो। जो खोजने चला है, उसे ही खोजना है।
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यह बात कुछ चिराग ले कर ढूंढने की नहीं है पुरुषोत्तम ! ढूंढने में ही लोग व्यस्त हैं ! ढूंढने में ही लोग परेशान हैं। ढूंढने में ही लोग चूक रहे हैं। जिंदगी है वर्तमान। जिंदगी है--अभी और यहां। और तुम कहीं-कहीं भटक रहे हो !
ओशो

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