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*आत्म मांहै ऊपजै, दादू पंगुल ज्ञान ।*
*कृतम् जाइ उलंघि करि, जहां निरंजन थान ॥*
*आत्म बोध बँझ का बेटा, गुरु मुखि उपजै आइ ।*
*दादू पंगुल पंच बिन, जहाँ राम तहँ जाइ ॥*
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*साभार : @Subhash Jain*
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बुद्ध रोज रात्रि को, जब उनका प्रवचन पूरा होता, तो कहते थे नियम से कि भिक्षुओ, अब जाओ। दिवस का अन्त हुआ, अब अन्तिम कार्य पूरा करो, ताकि दिवस की पूर्णाहुति हो। विश्राम के पहले कार्य पूरा कर लेना। रोज रोज कहने की जरूरत नहीं थी। मतलब था कि ध्यान करके और सो जाओ। रोज रोज क्या कहना, एक दफा समझा दिया था, हजार दफे समझा दिया था, फिर तो यह प्रतीक हो गया था कि भिक्षुओ, अब अपना अंतिम कार्य पूरा कर लो और फिर विश्राम में जाओ।
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एक दिन सुबह उन्होंने कहा कि तुम्हें पता है भिक्षुओ, कल रात क्या हुआ ! जब मैंने तुमसे कहा कि अब उठो, अंतिम कार्य पूरा कर लो, यूं ही बहुत देर हो गयी है-तो तुम सब ध्यान करने चले गए। एक चोर भी आया हुआ था सभा में, वह एकदम चैंका वह बडा हैरान भी हुआ कि बुद्ध को कैसे पता चला कि मैं चोर हूं और मेरे काम का समय आ गया ! वह चोरी करने चला गया, कि गजब के आदमी हैं बुद्ध भी, कि खूब चेताया कि अब क्या बैठा है तू, अब उठ, अपने काम में लग! नही तो फिर पीछे पछताएगा।
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एक वेष्या भी आयी थी। वह भी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी, एक क्षण अवाक हो गयी। चैंक कर उसने बुद्ध को देखा कि क्या इनको खबर मिल गयी, क्या जासुस छोड़ रखे हैं। क्योंकि वह तो कपड़े वगैरह बदल कर आयी थी कि कोई उसे पहचान भी न सके। ऐसी ही बन कर आयी थी कि जैसे भिक्षुनी हो। कैसे इनको पता चल गया ! जाऊं। रात देर हुई जाती है, ग्राहक आने लगे होंगे। अंतिम काम पूरा करूं।
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चोर चोरी करने चला गया, वेष्या अपनी दुकानदारी पर चली गयी, भिक्षु ध्यान करने लगे। बुद्ध ने एक ही बात कही थी, तीन तरह के लोंगो ने तीन तरह के अर्थ निकाल लिए। पाण्डित्य बोध नहीं है। बोध तो ध्यान से मिलता है। बोध तो समाधि से मिलता है। पाण्डित्य मिलता है अध्ययन से,चिन्तन से, सोच-विचार से। दोनों की प्रक्रियाएं अलग हैं। बोध मिलता है निर्विचार होने से, निष्चिंत होने से, मन के पार होने से! अ-मनी दषा में बोध जगता है। और पाण्डित्य तो मन का हीे खेल है।
ओशो

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