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*दादू एक जीभ केता कहूँ, पूरण ब्रह्म अगाध ।*
*वेद कतेबां मित नहीं, थकित भये सब साध ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ हैरान का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*गोविंद चंद जु आय निशा,*
*सुपने महि भेद सबै हि जनायो ।*
*मैं जु रहौं खिर का१ बिच गो इक,*
*सांझ रु भोर हुं दूध सिचायो ॥*
*रूप अनूप प्रकट्ट कर्यो छवि,*
*को वरणै थकि जात लखायो ।*
*सागर गागर मांहिं न मावत,*
*नागर२ को भज पार न पायो ॥३१९॥*
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श्रीगोविन्दचन्द्रजी ने रात्रि में आपके स्वप्न में आकर अपना सारा रहस्य बताया अर्थात् कहा— अमुक गायों के बाड़े१ में अमुक स्थान पर मेरी मूर्ति है, भूमि खोदकर निकालो और स्थापन करो।
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जहाँ मूर्ति है वहाँ एक गाय सायं प्रातः आकर खड़ी होती है, तब उसके थनों से दूध की धारा चलने लगती है। इस प्रकार वह मुझ पर दूध चढ़ाती है।
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फिर रूप सनातनजी ने श्रीगोविन्दचन्द्रजी की मूर्ति प्रकट की। उसकी शोभा ऐसी अनुपम है कि उसे देखकर उसके वर्णन करने में कवि थकित हो जाते हैं। देखते ही बनता है, कथन नहीं होता।
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मैं कहाँ तक कथन करूँ, सागर कहीं गागर में समा सकता है क्या ? जो उन परम चतुर२ भगवान् का भजन करते हैं, वे भक्तजन भी उनके यश का कथन करके पार नहीं पा सके, तब बताइये मैं पूर्ण रूप से कह ही कैसे सकता हूँ ? ॥
(क्रमशः)

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