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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग १०५/१०८*
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म्रित्यु न सूझै मानवी६, क्यों बूझै तिथि वार ।
कहि जगजीवन सुभ असुभ, रांम भगति बिन सार ॥१०५॥
(६. मानवी=मनुष्य)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मृत्यु जो निश्चित है वह.तो जीव को सूझती नहीं । फिर तिथि वार क्यों पूछता रहता है । संत कहते हैं कि प्रभु की भक्ति के बिना शुभ अशुभ कोइ सार नहीं है ।
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कहि जगजीवन जोगि नर, बरतै वस्तु अजोगि७ ।
रांम भगति मंहि भोग भ्रम, यों तन ग्रास्यौ रोगि ॥१०६॥
{७. अजोगि=अयुक्त(अस्वास्थ्यकर)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि योगी जन जब अयोग्य वस्तु का उपयोग करते हैं तो वह रोग का कारण बनकर जीव को मृत्यु की और लेजाती है ।
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अम्रित अमी अति रांम रस, ताहि तजै बिष खाइ ।
कहि जगजीवन देह दुख, काल गिरासै आइ ॥१०७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि रामनामरस अमृत जैसी मीठा है उसे छोड़कर जीव विषयी रुपी विष खाता है जिससे देह दुखी होती है काल ग्रसित होता है ।
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कहि जगजीवन बलि मुवा, निरबल हुवा न नींच ।
रांम भगति बिन दूसरी, मुगध बसाई मींच ॥१०८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि बलि मर गया पर निर्बल न हुआ । तात्पर्य है कि जीव अहं में ही मर गया पर कभी प्रभु सन्मुख दीन नहीं हुआ । वह बिना प्रभु की भक्ति के दूसरी विषय विधाओं में पड़कर मृत्यु का ग्रास बना ।
(क्रमशः)

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