शनिवार, 11 मार्च 2023

*कामिनी-कांचन-त्याग*

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*देखा देखी सब चले, पार न पहुँच्या जाइ ।*
*दादू आसन पहल के, फिर फिर बैठे आइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(२) कामिनी-कांचन-त्याग*
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श्रीरामकृष्ण(मास्टर से) - अच्छा, आदमियों का त्याग तिल तिल करके होता है, परन्तु इनकी(लड़कों की) कैसी अवस्था है ?
"विनोद ने कहा, 'स्त्री के साथ सोना पड़ता है, मन को जरा भी नहीं रुचता ।"
"देखो, संग हो या न हो, एक साथ सोना भी बुरा है । देह का संघर्ष - देह की गरमी तो लगती ही है ।
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"द्विज की कैसी अवस्था है ! बस देह हिलाता हुआ मेरी ओर देखता रहता है । यह क्या कम बात है ? सब मन सिमटकर अगर मुझमे आ गया तो समझो सब कुछ हो गया ।
"मैं और क्या हूँ ? - वे ही हैं । मैं यन्त्र हूँ, वे यन्त्री । इसके (मेरे) भीतर ईश्वर की सत्ता है, इसीलिए आकर्षण इतना बढ़ रहा है, लोग खिंचे आते हैं । छूने से ही हो जाता है । वह आकर्षण ईश्वर का ही आकर्षण है ।
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“तारक (बेलघर के) वहाँ से (दक्षिणेश्वर से) घर लौट रहा था । मैंने देखा, इसके (मेरे) भीतर से शिखा की तरह जलता हुआ कुछ निकल गया – उसके पीछे पीछे ।
"कुछ दिनों बाद तारक फिर आया । तब समाधिस्थ होकर उसकी छाती पर पैर रख दिया – उन्होंने, जो इसके (मेरे) भीतर हैं ।
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"अच्छा, इन लड़कों की तरह क्या और लड़के है ?"
मास्टर - मोहित अच्छा है । आपके पास दो-एक बार आया था । दो परीक्षाओं के लिए तैयारी कर रहा है और ईश्वर पर अनुराग भी है ।
श्रीरामकृष्ण - यह हो सकता है, परन्तु इतना ऊंचा स्थान उसका नहीं है । शरीर के लक्षण उतने अच्छे नहीं हैं - मुँह चिपटा है ।
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"इसका स्थान ऊँचा है । परन्तु शरीर-धारण करने से ही आफतों में पड़ना है । और शाप रहा तब तो सात बार जन्म लेना ही होगा । बड़ी सावधानी से रहना पड़ता है । वासनाओं के रहने से ही शरीर-धारण होता है ।"
एक भक्त - जो अवतार हैं और देहधारण करके आये हैं, उनमें कौनसी वासना है ?
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श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - मैंने देखा है, मेरी सब वासनाएँ नहीं गयीं । एक साधु का शाल देखकर मेरी इच्छा हुई थी कि मैं भी इस तरह का शाल ओढूँ । अब भी है । कौन जाने, एक बार कहीं फिर न आना पड़े ।
बलराम (सहास्य) - आपका जन्म होगा शाल के लिए ?
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श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - एक अच्छी कामना रखनी चाहिए । उसी की चिन्ता करते हुए शरीर का त्याग हो, इसलिए । साधु चार धामों में एक धाम बाकी रख छोड़ते हैं । बहुतेरे जगन्नाथक्षेत्र बाकी रखते हैं । इसलिए कि जगन्नाथ की चिन्ता करते हुए शरीर-पात हो ।
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गेरूआ पहने हुए एक व्यक्ति कमरे के भीतर आये और नमस्कार किया । ये भीतर ही भीतर श्रीरामकृष्ण की निन्दा किया करते हैं । इसीलिए बलराम हँस रहे हैं । श्रीरामकृष्ण अन्तर्यामी हैं, बलराम से कह रहे हैं - 'कोई चिन्ता नहीं, यदि वे मुझे ढोंगी कहते हैं तो कहने दो ।’
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श्रीरामकृष्ण तेजचन्द्र के साथ बातचीत कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण (तेजचन्द्र से) - तुझे इतना बुला भेजता हूँ, तू आता क्यों नहीं ? अच्छा, ध्यान आदि करता है ? इसी से मुझे प्रसन्नता होगी । मैं तुझे अपना जानता हूँ इसलिए बुला भेजता हूँ ।
तेजचन्द्र - जी, आफिस जाना पड़ता है । काम भी बहुत रहता है ।
मास्टर (सहास्य) - घर में शादी थी, दस दिन की इन्होंने छुट्टी ली थी ।
श्रीरामकृष्ण - तो फिर, अवकाश नहीं है, अवकाश नहीं है - ऐसा क्यों कहा ? अभी तो तूने कहा था कि संसार छोड़ दूँगा ।
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नारायण - मास्टर ने एक दिन कहा था - संसार का अरण्यभाव ।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) - तुम वह कहानी जरा कहो तो । इन लोगों का उपकार होगा । शिष्य दवा खाकर अचेत हो रहा । गुरु ने आकर कहा, "इसके प्राण बच सकते हैं, अगर यह गोली कोई और खा ले । यह तो बच जायेगा परन्तु जो खायेगा, उसके प्राण निकल जायेंगे ।'
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"और वह भी कहो, - टेढ़ा-मेढ़ा हो गया था । उस हठयोगी के बारे में, जिसने सोचा था, स्त्री-पुत्र यही सब अपने आदमी हैं ।"
दोपहर को श्रीरामकृष्ण ने जगन्नाजी का प्रसाद पाया । रामकृष्ण ने कहा, ‘बलराम का अन्न शुद्ध है ।' भोजन के बाद कुछ देर के लिए वे विश्राम कर रहे हैं ।
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दोपहर ढल चुकी है । श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ उसी कमरे में बैठे हुए हैं । कर्ताभजा चन्द्रबाबू और वे रसिक ब्राह्मण भी हैं । ब्राह्मण का स्वभाव एक तरह भाँड़ जैसा है । - वे एक बात कहते है और हँसते हँसते लोगों का पेट फूलने लगता है ।
श्रीरामकृष्ण ने कर्ताभजा सम्प्रदाय के लोगों पर बहुत सी बातें कही - रूप, स्वरूप, रज, वीर्य, पाकक्रिया आदि बहुतसी बातों का उल्लेख किया ।
(क्रमशः)

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