मंगलवार, 14 मार्च 2023

परमारथ कूं सब किया

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*तुम ही आदि अंत पुनि तुम ही,*
*तुम कर्ता त्रय लोक मंझार ।*
*कुछ नांही तैं कहा होत है,*
*दादू बलि पावे दीदार ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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सो सेवग क्यूं मारिये, सुनि संम्रथ सांई ।
ताकूं हाथ लगाइए, जे सनमुष नांहीं ॥टेक॥
परमारथ कूं सब किया, अपस्वारथ१ नांहीं ।
क्यूं ही करि साहिब मिलै, यहु उपजी मांहीं ॥
साधौं सूं२ सनमुष रहै, साहिब की सेवा ।
ताकूं दुष क्यों दीजिए, सुणि आतम देवा ॥
नहीं हुई सो होत है, कैसैं करि सहिये ।
हम थैं कछू न होत है, ताथैं तुम कहिये ॥
गुर दादू किरपा करै, तुम्ह सूं ले लावै ।
साहिबजी टीलौ कहै, तुझ दया न आवै ॥३४॥
(पाठान्तर : १. आप सवारथ, २. सौं)
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हे समर्थ स्वामी ! सुनो, सेवक को क्यों मारते हो ? अरे ! मारना ही है तो उसको मारिए, जो आपके सन्मुख नहीं है, आपकी शरण का आश्रय नहीं लेता है ॥टेक॥
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आपका सेवक जो कुछ करता है, वह सब परमार्थ के लिए करता है, अपने स्वार्थ-साधन के लिए कुछ नहीं करता । कैसे भी करके साहिब=परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा से मिलन हो जाए, बस, मन में यही मुमुक्षा बारम्बार उत्पन्न करता है ।
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सेवक की दिली इच्छा होती है कि वह ब्रह्मनिष्ठ साधुओं के सानिध्य में सदैव रहे तथा साहिबजी की सेवा रूप भक्ति का संपादन करे । हे आत्मस्वरूप परमात्मदेव ! सुनिए, ऐसे सेवक को दुख देकर क्यों दुखी करते हो ।
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अभी तक जो कुछ नहीं हुआ था वह अब हो रहा है, जो दुख, आपदा-विपदाएँ पहले कभी नहीं आई वे अब आ रही हैं, उनको कैसे कर सहा जा सकता है । हे परमात्मदेव ! उन आपदा-विपदाओं के निवारणार्थ हमसे तो कुछ होना सम्भव नहीं है । इसलिए आप ही कुछ उनके शमनार्थ कहिए=करिए ।
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गुरुमहाराज दादूजी ने कृपा की जिससे मैं तुम्हारे से लय लगा बैठा हूँ । हे साहिबजी ! सुनिए !! आपसे टीला उक्तप्रकार से प्रार्थना करता है । क्यों नहीं, आपको अपने सेवक पर दया आती है ? कृपा करके दया करो । कष्टों का हरण करो ॥३४॥
(क्रमशः)

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