मंगलवार, 14 मार्च 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #३०६

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३०६)*
*राग सोरठ ॥१९॥**(गायन समय रात्रि ९ से १२)*
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*३०६. ज्ञान उपदेश । त्रिताल*
*भाई रे, ऐसा एक विचारा, यूं हरि गुरु कहै हमारा ॥टेक॥*
*जागत सूते, सोवत सूते, जब लग राम न जाना ।*
*जागत जागे, सोवत जागे, जब राम नाम मन माना ॥१॥*
*देखत अंधे, अंध भी अंधे, जब लग सत्य न सूझै ।*
*देखत देखे, अंध भी देखे, जब राम सनेही बूझै ॥२॥*
*बोलत गूंगे, गूंगे भी गूंगे, जब लग सत्य न चीन्हा ।*
*बोलत बोले, गूंगे भी बोले, जब राम नाम कह दीन्हा ॥३॥*
*जीवत मूये, मूये भी मूये, जब लग नहीं प्रकासा ।*
*जीवत जीये, मुये भी जीये, दादू राम निवासा ॥४॥*
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भा०दी०-अद्भुतं विचारं प्रदर्शयति श्री दादूदेव:- अयं जीवो जानदवस्थायां बहिष्ठैरिन्द्रियैर्मिथ्याभूतमपि जगदिदं सत्यत्वेन मन्यते । अत: पारमार्थिकज्ञानाभावेन जाग्रदपि तस्य सुषुप्तवद् भक्ति यस्त्वविद्यायां सततं स्वपिति स तूभयदशायाम- पि सुप्त एव । अत स एव जागरितो भवति येन परब्रह्मपरमात्मनो रामस्य सर्वव्यापकं पारमार्थिक रूपं ज्ञातम् । अतो रामनामैव कल्याणसाधनमिति मत्वा तद्ध्यानपरायणा ये जातास्ते सर्वेऽपि पारमार्थिकरूपेण विमुक्ता भवन्ति । एवं ये जात्यन्धास्ते त्वन्धा एव परन्तु ये परमात्मन: पारमार्थिक रूपं विवेकाभावान जानन्ति, ते सत्यपि चक्षुषि सनेत्रा अपि अनेत्रकाः, अर्थादन्धसदृशा एव भवन्ति ।
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यदा तु सर्वप्रियं रामं सत्यत्वेन जानन्ति तदा सर्वेऽपि सचशुष्का: सनेत्रकाः । एवं ये मूकास्ते तु मूका एव परन्तु केवल वेदोच्चारणपात्रका: रमार्थज्ञानशून्यास्तेमूकसदृशाः । यदा च ते सत्य-ब्रह्म- तत्वज्ञा भवन्ति तदा ते न मूका भवन्ति । एवं ये केवलं भोगार्थमेव जीवन्ति ते मृततुल्या, नहि तेषां मनसि स्वल्पोऽपि ब्रह्मप्रकाशो भवति । ये तु ब्रह्मसाक्षात्कारं विना मृतास्ते जीवद्दशायामपि मृत तुल्या एव । अतो यदा वास्तविकं ब्रह्म ज्ञान भविष्यति तदा ते ब्रह्मनिष्ठाः सन्तो जीवन्मुक्ता भविष्यन्ति । तदैव तेषां जीवनसाफल्यं नान्यथेति ।
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उक्तं हि वासिष्ठे-
न शून्य-रूपं न च सत्स्वरूपं ब्रह्माभिधं भाति जगत्स्वरूपम् ।
तच्चापरिज्ञानवशादनर्थभूतं परिज्ञातवत: शिवात्मः ॥
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यह जीव जाग्रत दशा में बाह्य इन्द्रियों से इस मिथ्या जगत् को सत्य ही देखता है । अतः परमार्थिक ज्ञान के न होने से वह जागता हुआ भी वास्तव में अज्ञान में ही सो रहा है और जो दोनों अवस्थाओं में अविद्या से सो रहा है, वह तो सदा सोया हुआ ही माना जाता है । वह ही जागा हुआ माना जाता है जिसने उस राम को जो पारमार्थिक स्वरूप है, सर्वव्यापक है, जान लिया, वह जागा हुआ कहलाता है ।
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अतः राम नाम ही कल्याण का साधन है, ऐसा जानकर उसके स्वरूप के ध्यान में लग गया, वह जाग गया । इसी तरह जो अन्धे हैं, वे तो अन्धे हैं ही, किन्तु जो परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते, वे ज्ञान के अभाव से देखते हुए भी अन्धे ही हैं और जब सर्वप्रियस्वरूप राम को जान गये तब वे सभी नेत्र वाले हैं ।
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ऐसे जो गूंगे हैं वे तो गूंगे प्रसिद्ध हीं हैं, किन्तु जो केवल वेदों का उच्चारण करते हैं परन्तु अर्थ ज्ञान शून्य हैं, वेद के रहस्य को नहीं समझते, तब तक वे भी गूंगे ही हैं । जब सत्य-ब्रह्म तत्त्व को जान जायेंगे तब वे भी बोलने वाले माने जायेंगे । ऐसे ही जो केवल भोगों के लिये ही जीते हैं, वे जीते हुए भी मरे के तुल्य हैं, क्योंकि उनके मन में जरा सा भी ज्ञान का प्रकाश नहीं है, और जो बिना ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त किये ही मर गये, वे तो जीवन काल में भी मुर्दे ही थे । अतः जब ब्रह्म का वास्तविक ज्ञान हो जायगा तब ही वे ब्रहमनिष्ठ होकर जीवन्मुक्त माने जायेंगे । तभी उनका जीवन सफल माना जायगा ।
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योगवासिष्ठ में कहा है कि –
इस जगत् का स्वरूप स्वतः शून्य नहीं है और यह सत्य भी नहीं है, किन्तु ब्रह्म चैतन्य ही जगद् रूप से भासित हो रहा है । इसलिये ऐसा ज्ञान न होने से यह जगत् अनर्थ स्वरूप प्रतीत होता है । जो इसका जानकर ज्ञानी है उसके लिये यह अति आनन्द स्वरूप ही है ।
(क्रमशः)

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