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*मनसा मन शब्द सुरति, पाँचों थिर कीजे ।*
*एक अंग सदा संग, सहजैं रस पीजे ॥टेक॥*
*सकल रहित मूल गहित, आपा नहिं जानैं ।*
*अन्तर गति निर्मल रति, एकै मन मानैं ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ४३३)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*साँपनि रूप शिखा दृग देख रु,*
*जान सनातन काव्य विचारो ।*
*झूलत फूलत है द्रुम१ डारनि,*
*सो सर२ तीर हलान निहारो ॥*
*आय रु भ्रात के दे सु प्रदक्षिण,*
*आप डरे शिर ले पग धारो ।*
*भ्रात उभै सु अपार चरित्रन,*
*पेख जगे जग बात उचारो ॥३२९॥*
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रूपजी ने अपने काव्य में राधाजी की चोटी को ध्यानावस्था में नेत्रों से देखकर उसे नागिन की उपमा दी थी। किन्तु सनातन जी को दुष्ट जीव की उपमा अच्छी नहीं लगी। परन्तु काव्य की रीति विचार करके वे कुछ नहीं बोले।
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फिर एक दिन श्रीराधासर२ के तीर एक वृक्ष१ में झूला देखा, उस पर बहुत सी सखियाँ राधाजी को झुला रहीं हैं और राधाजी की वेणी ठीक नागिन की भांति लहलहाती हुई अत्यन्त शोभा दे रही है। यह देखकर आपको उस काव्य का स्मरण हो आया फिर तो आनन्द से फूले न समाये और ....
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अपने छोटे भाई रूपजी के पास आकर उनकी प्रदक्षिणा करके उनके चरणों में पड़ कर डरे हुये से चरणों को उठाकर अपने शिर पर रख लिया और सब बात कह सुनाई।
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दोनों भाइयों के प्रेमयुक्त अपार चरित्र हैं। मैंने स्थान स्थान पर जगत में देखकर ये कुछ कथायें कहीं हैं।
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आँमेर नरेश मानसिंह ने आपके दर्शन करके प्रार्थना की थी कि कुछ सेवा की आज्ञा दीजिये। आपने कहा- कोई आवश्यकता नहीं है। राजा ने बहुत हठ किया तब कहा - यदि श्रद्धा हो तो श्रीगोविन्ददेवजी का मन्दिर बना दो। राजा मानसिंह ने अकबर बादशाह से आज्ञा लेकर तेरह लाख रुपये लगाकर मन्दिर बना दिया था। उन्हीं दिनों में वि० सं० १६२१-१६३१ में अकबर आगरे का किला जिस लाल पत्थर से बना रहा था तब ही उक्त मन्दिर भी उसी लाल पत्थर का ही बना था। रूप सनातनजी ने गोविन्दचन्द्रजी की पूजा की आज्ञा जीवगोस्वामी को दी थी। ये गृहस्थाश्रम को त्याग कर आपके पास आ गये थे। वि० सं० १७७६ से १८०५ तक जिसका राज्य रहा था उस 'मुहम्मद शाह' के समय में जयपुर के राजा जयसिंहजी गोविन्ददेवजी को जयपुर ले आये थे। रूप, सनातन दोनों ही वृन्दावन में गोलोक वासी हुये थे ।
(क्रमशः)

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