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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग ११३/११५*
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कहि जगजीवन रांमजी, निद्रा बैरणि आइ ।
विमुख करै हरि नांम सौं, सतगुरु बरजौ ताहि ॥११३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु ये निद्रा हरि नाम की शत्रु है ये प्रभु नाम से विमुख करती है आप ही इससे बचाइये ।
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निद्रा नर की नाड़ी३ गहै, ऊपर बैठै आइ ।
जगजीवन जांणै नहीं, तैसैं तन कूं खाइ ॥११४॥
(३. नाड़ी=मर्मस्थल)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि निद्रा जीव के मर्म स्थल को लेकर उसपर अपना अधिकार कर लेती है । पता ही नहीं चलता कि यह देह को कैसे खा जाती है मिटा देती है क्षीण कर देती है ।
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निद्रा मारे जीव कूं, अहार करै जहां पूरि ।
जगजीवन करतार थैं, तिल तिल पाड़ै४ दूरि ॥११५॥
(४. पाड़ै=दूर कर दे)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि निद्रा जीव का ह्रास करती है । यह उसे अपना पूर्ण आहार बना लेती है । और यह धीरे-धीरे प्रभु से बिल्कुल दूर कर देती है ।
(क्रमशः)

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