शनिवार, 18 मार्च 2023

*विचार के अन्त में मन का नाश तथा ब्रह्मज्ञान*

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*मीत तुम्हारा तुम्ह कनै, तुम ही लेहु पिछान ।*
*दादू दूर न देखिये, प्रतिबिम्ब ज्यों जान ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(३)विचार के अन्त में मन का नाश तथा ब्रह्मज्ञान*
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आज रथ यात्रा है । दिन मंगलवार । प्रातः काल उठकर श्रीरामकृष्ण नृत्य करते हुए मधुर कण्ठ से नाम ले रहे हैं ।
मास्टर ने आकर प्रणाम किया । क्रमशः भक्तगण आकर प्रणाम करके श्रीरामकृष्ण के पास बैठे । श्रीरामकृष्ण पूर्ण के लिए बहुत व्याकुल हो रहे हैं । मास्टर को देखकर उन्हीं की बातें कर रहे हैं 
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श्रीरामकृष्ण - तुम पूर्ण को देखकर क्या कोई उपदेश दे रहे थे ?

मास्टर - जी, मैंने चैतन्य चरितामृत पढ़ने के लिए उससे कहा था । उस पुस्तक की बातें वह खूब बतला सकता है । और आपने कहा था सत्य को पकड़े रहने के लिए; यह बात भी मैंने कही थी ।
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श्रीरामकृष्ण - अच्छा, 'ये (श्रीरामकृष्ण) अवतार हैं' इन सब बातों के बताने पर क्या कहता था ?
मास्टर - मैंने कहा था, 'चैतन्यदेव की तरह एक और आदमी देखना हो तो चलो ।'
श्रीरामकृष्ण - और भी कुछ ?
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मास्टर - आपकी वही बात । छोटी-सी गड़ही में हाथी उतर जाता है तो पानी में उथल-पुथल मच जाती है, - आधार के छोटे होने पर उसमें से भाव छलककर गिरता है ।
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लगभग साढ़े छ: का समय है । बलराम के घर से मास्टर गंगा नहाने के लिए जा रहे हैं । रास्ते में एकाएक भूकम्प होने लगा । वे उसी समय श्रीरामकृष्ण के कमरे में लौट आये । श्रीरामकृष्ण बैठकखाने में खड़े हुए हैं । भक्तगण भी खड़े हैं । भूकम्प की बात हो रही है । कम्प कुछ अधिक हुआ था । भक्तों में बहुतों को भय हो गया था ।
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मास्टर - तुम सब लोगों को नीचे चले जाना चाहिए था ।
श्रीरामकृष्ण - जिस घर में रहते हैं, उसी की तो यह दशा है ! इस पर फिर आदमियों का अहंकार ! (मास्टर से) तुम्हें वह आश्विन की आँधी याद है ?
मास्टर - जी हाँ, तब मेरी उम्र बहुत थोड़ी थी – नौ-दस साल की रही होगी - मैं कमरे में अकेला देवताओं का नाम ले रहा था ।
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मास्टर विस्मय में आकर सोच रहे हैं, 'श्रीरामकृष्ण ने एकाएक आश्विन की आँधी की बात क्यों चलायी ? मैं व्याकुल होकर एक कमरे में बैठा हुआ ईश्वर की प्रार्थना कर रहा था; श्रीरामकृष्ण क्या सब जानते हैं ? वे क्या मुझे उसकी याद दिला दे रहे हैं ? मेरे जन्म के समय से ही वे क्या गुरु-रूप से मेरी रक्षा कर रहे हैं ?"
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श्रीरामकृष्ण - जब दक्षिणेश्वर में आँधी आयी, उस समय दिन बहुत चढ़ गया था, पर कैसा भी करके भोग पकाया गया था । देखो, जिस घर में निवास है, उसी की यह हालत है !
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"परन्तु पूर्ण ज्ञान के होने पर मरना और मारना एक जान पड़ता है । मरने पर भी कुछ नहीं मरता - मार डालने पर भी कुछ नहीं मारता । जिनकी लीला है, नित्यता भी उन्हीं की है । एक रूप में नित्यता है और दूसरे रूप में लीला । लीला का रूप नष्ट हो जाने पर भी उसकी नित्यता नहीं जाती । पानी के स्थिर रहने पर भी वह पानी है और हिलने-डुलने पर भी पानी ही है । फिर हिलकर, उस हिलने के बन्द हो जाने पर भी वह वही पानी है ।"
(क्रमशः)

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