शुक्रवार, 24 मार्च 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #३०९

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३०९)*
*राग सोरठ ॥१९॥**(गायन समय रात्रि ९ से १२)*
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*३०९. परिचय विनती । वर्ण भिन्न ताल*
*राम जी जनि भरमावो हम को, तातैं करूं विनती तुमको ॥टेक॥*
*चरण तुम्हारे सब ही देखूं, तप तीरथ व्रत दाना ।*
*गंग जमुन पास पाइन के, तहाँ देहु अस्नाना ॥१॥*
*संग तुम्हारे सब ही लागे, योग यज्ञ जे कीजे ।*
*साधन सकल येही सब मेरे, संग आपनो दीजैं ॥२॥*
*पूजा पाती देवी देवल, सब देखूं तुम मांहीं ।*
*मोको ओट आपणी दीजे, चरण कवल की छांहीं ॥३॥*
*ये अरदास दास की सुनिये, दूर करो भ्रम मेरा ।*
*दादू तुम बिन और न जानै, राखो चरणों नेरा ॥४॥*
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भादी-हे प्रभो ! ईदशी कृपां कुरु यया मे मनः साधनान्तरेषु न भ्रमेत् । यतोहि तब चरणारविन्दयोरेव व्रततीर्थदानादीनि सन्ति । तव चरणसेवा हि गंगायमुनास्नाने मे मतम् । मे तव चरणसामीप्ये हि यज्ञयागयोगादिसाधनम् तव पूजैव देवपूजनम् तव सेवैव तूलसीपत्रार्पणम् । देवीदेवता अपि तव स्वरूपमेव । एतादृशी बुद्धि देहि । तव चरणच्छायायामागतोऽस्मि । मां मा विमुञ्च । तव चरणशरणमागत्य नान्यमुपास्यं मे भवेदित्येव तो बुद्धि प्रदेहि ।
उक्तं हि भवान्यष्टके-शङ्कराचायेंण-
न जानामि दानं न च ध्यानयोगं न जानामि तंत्रं न च स्तोत्रमंत्रम् । न जानामि पूजां न च न्यासयोगं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि! न जानामि पुण्ये न जानामि तीर्थ न जानामि मुक्ति लयं वा कदाचित् । न जानामि भक्ति व्रतं वाऽपि मात गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि!
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हे प्रभो ! ऐसी कृपा कीजिये, जिससे मेरा मन किसी साधनान्तर में न भटके । क्योंकि आपके चरण-कमलों में ही व्रत, तीर्थ, दान आदि साधन समाहित हो जाते हैं । मैं तो तेरे चरण-कमलों की सेवा को ही गंगा-यमुना का स्नान मानता हूँ । तेरे चरणों के पास रहना ही यज्ञ-यागादि साधन हैं, आपकी पूजा ही देवपूजा है । आपके चरणों की सेवा ही तुलसी-पत्र का समर्पण है । देवी-देवता भी आपके स्वरूप ही हैं, ऐसी बुद्धि प्रदान करें । क्योंकि मैं तो आपके चरणों में आ गया हूँ । अब मुझे छोड़ो मत । आपके चरण शरण में आकर मेरा अन्य कोई उपास्य न हो, ऐसी बुद्धि प्रदान करें ।
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भवानी-अष्टक में श्रीशंकराचार्य जी लिख रहे हैं कि –
हे देवी ! मैं तो दान देना नहीं जानता हूं और न ध्यान-योग को ही जानता हूं, तन्त्र, स्तोत्र, मंत्रों का भी ज्ञान नहीं है । पूजा तथा न्यास आदि क्रियाओं से एकदम शून्य हूं । मेरे तो आप ही एक मात्र गति हैं ।
न मैं पुण्य तथा न तीर्थों में जाता । मुझे मुक्ति का भी पता नहीं है । न लय-योग को जानता । अब केवल आपका ही सहारा है ।
(क्रमशः)

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