बुधवार, 22 मार्च 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #३०८

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३०८)*
*राग सोरठ ॥१९॥**(गायन समय रात्रि ९ से १२)*
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*३०८. भ्रम विध्वंसन । एक ताल*
*साधो ! हरि सौं हेत हमारा, जिन यहु कीन्ह पसारा ॥टेक॥*
*जा कारणि व्रत कीजे, तिल तिल यहु तन छीजे ।*
*सहजैं ही सो जाना, हरि जानत ही मन माना ॥१॥*
*जा कारणि तप जइये, धूप सीत सिर सहिये ।*
*सहजैं ही सो आवा, हरि आवत ही सचु पावा ॥२॥*
*जा कारण बहु फिरिये, कर तीरथ भ्रमि भ्रमि मरिये ।*
*सहजैं ही सो चीन्हा, हरि चीन्ह सबै सुख लीन्हा ॥३॥*
*प्रेम भक्ति जिन जानी, सो काहे भरमै प्राणी ।*
*हरि सहजैं ही भल मानैं, तातैं दादू और न जानैं ॥४॥*
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भा०दी०-हे महात्मन् ! येन परमात्मना बहुविस्तृतं जगदिदं विरचितं, स एव मे प्रेमपात्रम् । यत्प्राप्तये केचिद् व्रतानुष्ठानेन शरीरं शोषयन्ति, स: प्रभुः प्रेम्णैव मया केवलेन प्राप्तम् । तत्प्राप्त्या च संतुष्टं मे मनः । यदर्थं तपांसि तपन्ति, तीर्थाटनं कुर्वन्ति, शीतोष्णादिद्वन्दं सहन्ते, सोऽयं प्रभुर्मया त्वनायासेनैव केवलं प्रेमभक्त्या प्राप्तः, परमानन्दश्च प्राप्त: । यस्य हदि प्रभुप्रेम विराजते, तस्य बाधि- नासाधनैः किं प्रयोजनम्? भक्तिप्रियो हि हरिः, न च साधनसाध्यः । अहन्तु सर्वसाधनानि विहाय केवलं हरिनामसाधनमेव श्रेयस्करं मन्ये ।
उक्तं हि हरिनामाष्टके-
न मुनिर्योगी ज्ञानी परम बुधमानी च यदृते
सिद्धि यान्तीति स्फुटमभिहितं श्रीशुकमुखैः ।
विना यद् धर्मोऽपि प्रभवति हाधर्मो नु विमुखः !
विहायैतन्नामेच्छसि शिवमये हा नर! कथम् ?
यो नरैः स्मृतमात्रोऽपि हरते पापपर्वतम् ।
तं मुक्त्वा क्लिश्यते मूढो योगयागवतादिभिः ।
किं यागैर्विवधै रम्यैः सर्वसंभारसंवृतैः ।
स्वल्पपुण्यप्रदै नूनं क्षयिष्णुपददातृकैः ॥
मूढो लोको हरिं त्यक्त्वा करोत्यन्यसर्मचनम् ।
रघुवीरं रमानार्थ स्थिरैश्वर्यप्रदं विभुम् ॥
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हे महात्मन् ! जिस परमात्मा ने इस जगत को क्षणमात्र में बना डाला, मैं उसी प्रभु से प्रेम करता हूँ । जिसको प्राप्ति के लिये व्रतों का अनुष्ठान करके शरीर को सुखा देते हैं, उस परमात्मा को मैंने तो केवल प्रेम से ही प्राप्त कर लिया और मेरा मन उनकी प्राप्ति से संतुष्ट हो गया । जिनके हृदय में प्रभु-प्रेम समागम, उनको अन्य साधनों की क्या आवश्यकता है? भगवान् को तो प्रेम ही प्यारा है, और साधनों से वह प्राप्त भी नहीं होता । मैं तो सारे साधनों को छोड़कर केवल हरि नाम को ही उसकी प्राप्ति का मुख्य साधन मानता हूं ।
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हरि-नाम-महिमाष्टक में लिखा है कि –
जिस हरि-नाम के बिना मुनि, ज्ञानी, योगी और पण्डिताभिमानी आदि सिद्धि को प्राप्त नहीं हो सकते, हरिनाम से विमुख जीव से किया हुआ धर्म भी अधर्म हो जाता है, उस हरिनाम को छोड़ कर तू अपना कल्याण कैसे चाहता है ?
जो हरि नाम मनुष्यों के स्मरण करने मात्र से उनके पर्वताकार पापों का भी नाश कर देता है, उस भगवान् के नाम को छोड़कर मूढ-मनुष्य यज्ञ, याग, व्रतादिक अनुष्ठान करने में क्लेश ही पाता है । सब सामग्री एकत्रित करके अनेक सुन्दर-सुन्दर यज्ञों के अनुष्ठान से क्या लाभ है? वे तो स्वल्प पुण्य प्रदान करने वाले हैं । उनसे क्षणभंगुर पद की ही प्राप्ति होती है । स्थिर ऐश्वर्य पद को देने वाले तो एक मात्र रमानाथ भगवान् राम ही हैं । अतः जो लोग भगवान् को छोड़कर दूसरे की पूजा करते हैं, वे मूढ़ हैं । अतः उनके नामों को ही जानना चाहिये ।
(क्रमशः)

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