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*दादू राम अगाध है, अकल अगोचर एक ।*
*दादू राम विलम्बिए, साधू कहैं अनेक ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग केदार ८(संध्या ६ से ९ रात्रि)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१२७ । एक ताल
ऐसा तेरा नाम निधाना१, करे को वक्त्र२ बखाना ।
शिव विरंचि शुक आदि शेष मुख, ह्वै नहि सके प्रमान३ ॥टेक॥
नेति४ नेति कहि निगम५ पुकारता, उससे जाय न जाना ।
रज्जब कहा कहै इक रसना, सब जानत है हैरान६ ॥१॥८॥
✦ प्रभो ! आपका नाम ऐसा महान कोष१ है कि - उसका मुख२ से तो कौन कथन कर सकता है ? शंकर ब्रह्म शुकदेव आदि मुनि और हजार मुख वाले शेष जी से भी उसकी सीमा३ का निर्णय नहीं ले सकता ।
✦ वेद५ भी “यह नहीं४, यह नहीं” कहकर पुकारता है, उससे से भी नाम यथार्थ रूप से नहीं जाना जाता फिर एक जिह्वा वाला मैं तो कह भी क्या सकता हूँ, सभी नाम की महानता को जानकर आश्चर्य६ चकित है ।
(क्रमशः)

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