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*दादू राम हृदय रस भेलि कर, को साधु शब्द सुनाइ ।*
*जानो कर दीपक दिया, भ्रम तिमिर सब जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*जीव गोस्वामी*
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*जीव गुसांई अब्धि बड़, रूप सनातन भजन जल ॥*
*प्रेम पाल परिपक्व, आन विधि फूटे नांहीं ।*
*युगल रूप से प्रीति, बसत वृन्दावन मांहीं ॥*
*अघट अक्षर मन लगा, कलम पुस्तक कर राजै ।*
*शास्त्र रु वेद पुराण, सार उर मध्य विराजै ॥*
*राघव रसिक उपासना, संशय काटन अति सबल ।*
*जीव गुसांई अब्धि बड़, रूप सनातन भजन जल ॥२५१॥*
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रूप और सनातनजी के भजन और भजन सम्बन्धी उपदेश रूप जल के, उनके भतीजे तथा शिष्य जीवगोस्वामी विशाल समुद्र थे अर्थात् रूप व सनातनजी का भक्ति रूप तथा भक्तिसम्बन्धी विचार जल इन के हृदय में बहुत भर गया था। किन्तु इनका प्रभु-प्रेम रूप बाँध बहुत पक्का होने से, अन्य कामादि विकार रूप किसी भी प्रकार के विघ्न से टूटता नहीं था।
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न टूटने में एक और भी महान् कारण था कि आपका मन अघट (अन्य किसी से लिखे न जा सकें ऐसे सुन्दर) अक्षरों के लिखने में लगा रहता था। आपके हाथ में प्रायः लेखनी और पुस्तक ही शोभा देती रहती थीं। आपके हृदय में वेद, शास्त्र और पुराणों का सार स्थित रहता था।
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उपासना करने वाले रसिक भक्तों के संशय काटने में आपके विचार अति सबल थे। आपकी श्रीराधा कृष्ण के युगल रूप में प्रीति थी। आप वृन्दावन में ही रहते थे, वृन्दावन से बाहर रात्रि में नहीं रहते थे। इन की प्रशंसा सुनकर अकबर बादशाह ने इनको शीघ्रगामी घोड़ों की बग्गी के द्वारा सत्संग निमित्त थोड़ी देर के लिये आगरा बुलाया था। बादशाह ने सेवा के लिये प्रार्थना की थी तब आपने वृन्दावन में एक विशाल संस्कृत पुस्तकालय खोलने की आज्ञा दी थी। बादशाह ने आज्ञानुसार किया था। शीघ्र ही पीछे वृन्दावन में आप को लौटा दिया। रात्रि को वृन्दावन में आ गये थे ॥२५१॥
(क्रमशः)

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