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*दादू मैं नाहीं तब एक है, मैं आई तब दोइ ।*
*मैं तैं पड़दा मिट गया, तब ज्यूं था त्यूं ही होइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बैठकखाने में बैठे हुए हैं । महेन्द्र मुखर्जी, हरिबाबू, छोटे नरेन्द्र तथा अन्य कई बालक-भक्त बैठे हुए हैं । हरिबाबू अकेले ही रहते हैं, वेदान्त की चर्चा किया करते हैं, उम्र २३-२४ साल की होगी । विवाह नहीं किया है । श्रीरामकृष्ण इन्हें बड़ा प्यार करते हैं । सदा दक्षिणेश्वर आने के लिए कहा करते हैं । वे अकेले ही रहना पसन्द करते हैं, इसलिए श्रीरामकृष्ण के पास भी अधिक नहीं जाया करते ।
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श्रीरामकृष्ण (हरिबाबू से) - क्यों जी, तुम बहुत दिन नहीं आये ?
"वे एक रूप से नित्य हैं, एक रूप से लीला । वेदान्त में क्या है ? ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या । परन्तु जब तक उन्होंने 'भक्त का मैं' रख दिया है, तब तक लीला भी सत्य है । 'मैं' को जब वे पोंछ डालेंगे, तब जो कुछ है, वही है । मुँह से उसका वर्णन नहीं हो सकता । 'मैं' को जब तक उन्होंने रखा है, तब तक सब मानना होगा ।
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केले के पेड़ के खोलों को निकालते रहने पर उसका माझा मिलता है । अतएव खोलों के रहने पर माझा का रहना भी सिद्ध होता है और माझे के रहने पर खोलों का । खोलों का ही माझा है और माझे का ही खोल है । नित्य है, यह कहने से लीला का अस्तित्व सिद्ध होता है; और लीला है, यह कहने पर नित्य का अस्तित्व ।
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"वे ही जीव और जगत् हुए हैं, चौबीसों तत्त्व हुए हैं । जब वे निष्क्रिय हैं, तब उन्हें लोग ब्रह्म कहते हैं और जब सृष्टि, स्थिति और संहार करते हैं तब उन्हें शक्ति कहते हैं । ब्रह्म और शक्ति दोनों अभेद हैं । पानी स्थिर रहने पर भी पानी है और हिलने डुलने पर भी पानी ही है ।
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" 'मैं' का भाव दूर नहीं होता । जब तक 'मैं' का भाव है, तब तक जीव-जगत् को मिथ्या कहने का अधिकार नहीं है । बेल के खोपड़े और बीजों को फेंक देने पर, कुल बेल का वजन समझ नहीं आता ।
"जिस ईंट, चूना और सुर्खी से छत बनी है, उसी से सीढ़ियाँ भी बनी हैं । जो ब्रह्म है उन्हीं की सत्ता से यह जीव-जगत् भी बना है ।
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"भक्त और विज्ञानी निराकार और साकार दोनों मानते हैं - अरूप और रूप दोनों को ग्रहण करते हैं, भक्तिरूपी हिम के लगने से उसी जल का कुछ अंश बर्फ बन जाता है । फिर ज्ञान-सूर्य के उगने पर वह बर्फ गलकर जल का फिर जल ही हो जाता है ।
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"जब तक मनुष्य मन के द्वारा विचार करता है, तब तक वह नित्य को नहीं प्राप्त कर सकता । जब तक तुम अपने मन का सहारा लेकर विचार करते हो तब तक तुम संसार के परे नहीं जा सकते, तथा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द आदि इन्द्रिय-विषयों को भी नहीं छोड़ सकते । विचार के बन्द होने पर ही ब्रह्मज्ञान होता है । इस मन से कोई आत्मा को जान नहीं सकता । आत्मा के द्वारा ही आत्मा का ज्ञान प्राप्त होता है । शुद्ध मन, शुद्ध बुद्धि, शुद्ध आत्मा, ये सब एक ही वस्तु हैं ।
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"देखो न, एक ही वस्तु को देखने के लिए कितनी चीजों की आवश्यकता होती है । आँखें चाहिए, उजाला चाहिए और मन का संयोग होना चाहिए । इन तीनों में से किसी एक को छोड़ देने से दर्शन नहीं होता । मन का यह काम जब तक चल रहा है, तब तक किस तरह कहोगे कि संसार नहीं है या मैं नहीं हूँ ?
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"मन का नाश होने पर, संकल्प और विकल्प के चले जाने पर समाधि होती है - ब्रह्मज्ञान होता है । परन्तु – सा, रे, ग, म, प, ध, नि - 'नि' में बड़ी देर तक नहीं रहा जाता ।”
छोटे नरेन्द्र की ओर देखकर श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, " ‘ईश्वर है' - केवल इतना ही आभास पाने से क्या होगा ? ईश्वर की केवल झलक से ही सब कुछ हो जाता हो, सो बात नहीं ।
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"उन्हें अपने घर ले आना चाहिए - उनसे जान-पहचान करनी चाहिए ।
"किसी ने दूध की बात सुनी ही है, किसी ने दूध देखा है और किसी ने पिया है ।
"राजा को किसी किसी ने देखा है, परन्तु दो एक आदमी उन्हें अपने मकान ले आ सकते हैं और उन्हें खिला-पिला सकते हैं ।"
मास्टर गंगा-स्नान के लिए गये ।
(क्रमशः)
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