बुधवार, 29 मार्च 2023

*२९. संजीवन कौ अंग ५/८*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२९. संजीवन कौ अंग ५/८*
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जीव रहै निरजीव मंहि, नांम संजीवनि त्यागि ।
कहि जगजीवन टापरै३, ताथैं लागी आगि ॥५॥
(३. टापरै=ऊसर भूमि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव प्रभु में रहे व स्मरण न करें जो कि संजीवनी जैसा है जिससे जीव स्थित है तो फिर समझिये कि ऊसर भूमि भी दह उठी हो । जो अविकारी है । उसका स्मरण न करना ही विकार हो जाता है ।
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जीव रहै सर जीव मंहि, सदा अमर सोइ साध ।
कहि जगजीवन तहँ रहै, जे हरि अलख अगाध ॥६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो जीव सदा प्रभु शरण में रहे वह अमर है वह वहां रहता है जहाँ प्रभु रहते हैं ।
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जाण्यां सो जीवै सुखी, अविनासी का अंग ।
जगजीवन तन खोजि हरि, निरभै पायौ संग ॥७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिसने प्रभु को जान लिया वह सुखी है वह प्रभु का अंग हो गया उसने देह में ही परमात्मा ढूंढ कर उनका सानिध्य पा लिया है ।
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जगजीवन हरि सेविये, पड़न४ न दीजै४ देह ।
कीजै प्रीती एक सौं, दिन दिन दूंना नेह ॥८॥
(४-४. पड़न न दीजै=गिरने न दे)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु की सेवा प्रभु ध्यान कीजिये देह गिरने से पहले । एक परमात्मा से ही दिन दिन द्विगुणित होता स्नेह करें ।
(क्रमशः)

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