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*ज्यों ज्यों होवै त्यों कहै, घट बध कहै न जाइ ।*
*दादू सो सुध आत्मा, साधू परसै आइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*श्रीनाथ भट्ट*
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*छप्पय-*
*गोविन्द इष्ट शिर भक्त-भूप१,*
*मधुर वचन श्रीनाथ भट्ट ॥*
*श्रुति स्मृति अरु शास्त्र,*
*पुराण भारत भल खोले।*
*सब ग्रंथन को सार,*
*आप पारा ज्यौं जो ले ॥*
*पूरवजा२ जिमि कह्यो,*
*आदि श्रीरूप सनातन।*
*नारायण भट जीव,*
*हृदय धार्यो सोई पन ॥*
*गोपाल अपत्य३ कुल नाग के,*
*दास भाव प्रेमा अघट ।*
*गोविन्द इष्ट शिर भक्त भूप,*
*मधुर वचन श्रीनाथ भट ॥२५२॥*
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भक्त-राज१ श्रीनाथ भट्ट ने मस्तक पर श्रीगोविन्दजी को ही इष्ट रूप में रखा था तथा सदा मधुर वचन ही बोला करते थे।
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श्रुति, स्मृति, शाख, पुराण और महाभारतादि सद् ग्रंथों का प्रवचन भली भांति खोलकर करते थे। जैसे पारा राख में पड़े हुये जो स्वर्ण कण होते हैं, उनको संग्रह कर लेता है, उसी प्रकार आपने सब सद् ग्रन्थों का सार अपने हृदय में संग्रह कर लिया था।
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अपने से पूर्व में उत्पन्न२ हुये महापुरुष-रूप, सनातन, नारायण भट्ट और जीवगोस्वामी आदि ने जैसे भक्ति करने का प्रकार कहा था, उसी प्रकार भक्ति करने का प्रण आपने अपने हृदय में धारण किया था।
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आप ऊँचे गाँव वाले नागवंशी गोपालदासजी के पुत्र३ थे और दास भाव के भक्त थे। आपकी प्रेमा भक्ति अघट(बेजोड़ थी) अर्थात् सबसे विलक्षण थी ॥२५२॥
(क्रमशः)

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