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*पारब्रह्म सूं प्रीति निरन्तर,*
*राम रसायन भर पीवै ।*
*सदा आनन्द सुखी साचे सौं,*
*कहै दादू सो जन जीवै ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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राग मारूकनबड़ौ ॥७॥
नैंननि देषि देषि देषि१, सोभित सुंदर सुष पायौ ।
सबहिन के जीवनि प्रांन, सो मेंरैं ग्रिह आयौ ॥टेक॥
मधुर बैंन निरमल नैंन, सुंदर सुषदाई ।
अन्तरगति हरि सूं रत, रहे रांम समाई ॥
परमभाग उदै जाग, चितवत सोइ पायौ ।
निरषि नैंन मुदित बैंन, आनद बधायौ ॥
जीवनि के२ भाग देषौ, साहिब रांम पठायौ ।
टीला गुर दादू देषि, साधनि सुष पायौ ॥३९॥
(पाठान्तर : १. तीन बार ‘देषि’ न होकर दो बार है, २. कौ ।)
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महाराज दादूजी से मिलने पर टीलाजी के मन में क्या-क्या भाव आए, का विवरण इस पद में है । शोभायमान सुन्दर शरीर को देख-देखकर मेरे नेत्रों ने अपार सुख पाया । गुरु महाराज दादूजी सभी के जीवनप्राण=सर्वस्व हैं । वे मेरे गृह में आ गए । मेरे हृदय में बस गए ।
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उनके वचन मधुर हैं, नयन निर्मल हैं, वृत्ति सुन्दर-उत्तम और सुखों को देने वाली है । उनका अन्तःकरण=मन सर्वतोभावेन परात्पर-परब्रह्म हरि में रत रहता है । वे सदैव रामजी में समाए रहते हैं ।
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मेरे परमभाग्य का उदय हुआ कि गुरु धारण करने का विचार मन में आते ही वे मेरे को तत्काल मिल गए । आँखों से देखकर और हर्षित करने वाले वचनों से संभाषण करके उन्होंने मेरे आनन्द को अनन्त गुणा बढ़ा दिया ।
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जीवों के भाग्य को देखो उनको परमानन्द का लाभ देने को परमात्मा ने ही अपने स्वरूपभूत रामजी रूप दादूजी को संसार में भेजा । टीला कहता है, गुरु महाराज दादूजी को देखकर साधुओं ने अनन्तानन्त अखण्ड सुख पाया ॥३९॥
(क्रमशः)

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