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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३११)*
*राग सोरठ ॥१९॥**(गायन समय रात्रि ९ से १२)*
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*३११. परिचय हैरान । खेमटा ताल*
*राम राइ ! मोको अचरज आवै, तेरा पार न कोई पावै ॥टेक॥*
*ब्रह्मादिक सनकादिक नारद, नेति नेति जे गावै ।*
*शरण तुम्हारी रहै निशवासर, तिनको तूँ न लखावै ॥१॥*
*शंकर शेष सबै सुर मुनिजन, तिनको तूँ न जनावै ।*
*तीन लोक रटैं रसना भर, तिनको तूँ न दिखावै ॥२॥*
*दीन लीन राम रंग राते, तिनको तूँ संग लावै ।*
*अपने अंग की युक्ति न जानै, सो मन तेरे भावै ॥३॥*
*सेवा संजम करें जप पूजा, शब्द न तिनको सुनावै ।*
*मैं अछोप हीन मति मेरी, दादू को दिखलावै ॥४॥*
इति राग सोरठ समाप्त ॥१९॥पद १४॥
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भा०दी०-हे विश्वाधिप राम ! तव साक्षात्कारं कुर्वता भयाऽऽश्चर्यमयं तव स्वरूपं दृष्टम् । तस्य पारावार न कोऽपि वेत्तुमर्हति । ब्रह्मादिदैवैः सनकादिमुनिभिर्नारदादिदेवर्षिभिनेति नेति शब्दरेव व्यवहीयन्ते । ये सततं त्वां शरणागतास्तेऽपि तवाद्यन्तं मध्यावधिं न जानन्ति । ये च तव बहुप्रिया: शङ्करशेषादयो देवा मुनयश्च दर्शनक्षमा अप्याद्यन्तं न ज्ञातवन्तः । अन्य चापि भक्ता नामप्रिया ये सततं नाम स्मरन्ति तव, तेऽप्याद्यन्त ज्ञानशून्या एव किन्तु तव भक्तिरसिका निरहंकारिणः प्रेमानुरक्ता- स्तल्लीना दीनभावेन त्वामुपासते ते त्वय्यभिन्नाः सन्तस्त्वद्रूपा भवन्ति शरीरासक्तिरहिता निष्किञ्चना भक्ता एव ते प्रिया भवन्ति । ते निरभिमानेन संयमितास्त्वां पूजयन्ति, तान्नपि त्वं वाक्यैकमपि न श्रावय । अहं तु निर्बुद्धिर्नहि बुद्धि बलेन त्वां ज्ञातुं स्पष्टुं वा शक्नोमि । किन्तु दीनभावेन निरभिमानेन च तव प्रपन्नो भक्तोऽस्मि । दयया स्वस्वरूपं दर्शय माम् ।
उक्तं वा. रा.
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभय सर्वभूतेभ्यो ददान्येतद्वतं मम ॥
श्री वैष्णव महारामायणे
प्रपन्नेति पदतु स्तूपाय त्वस्थानमुच्यते ।
उपायत्व भगवतस्तवेतिपदतस्तथा ॥
इति महाण्डलेश्वर श्रीमदात्मारामकृत भावार्थदीपिकायां रागसोरठः समाप्तः ॥ १९॥
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हे विश्व के स्वामी राम ! आपका साक्षात्कार करते हुए मैंने आपके आश्चर्यमय स्वरूप को देखा । आपके स्वरूप का वारापार कोई जान ही नहीं सकता । ब्रह्मा आदि देवता, सनकादि ऋषि, नारद आदि देवर्षि भी नेति-नेति शब्दों से जान पाए । जो सतत आपके ही शरण में रहते हैं, वे भी आपका आदि-अन्त को नहीं जान पाये ।
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जो आपके प्रिय शंकर, शेष आदि दर्शनों के योग्य हैं, वे भी आपके आदि-अन्त को नहीं जान सके । जो आपके भक्ति रस के रसिक निरहंकारी प्रेम में अनुरक्त आपमें लीन हुए दीन भाव से आपकी उपासना करते हैं, वे तो आपके स्वरूप ही हो गये । शरीर की आसक्ति से रहित निष्किञ्चन भक्त ही आपको प्रिय हैं । वे निरभिमानी भक्त संयम-पूर्वक आपको पूजते हैं, उनको भी आपने अपने विषय में एक वाक्य भी तो नहीं कहा । अब आप ही देखिये कि मैं तो निर्बुद्धि निर्बल हूं । अपने बुद्धि बल से तो आपको जान नहीं सकता किन्तु मैं तो आपका प्रिय भक्त हूं सो दया करके दर्शन दीजिये ।
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वाल्मीक रा. –
जो एक बार भी शरण में आकर ‘मैं आपका हूं’ ऐसा कह कर मुझ से रक्षा की प्रार्थना करता है, उसे मैं समस्त प्राणियों में अभय कर देता हूं । यह मेरा सदा का व्रत है । इस मन्त्र के प्रपन्न शब्द से प्रपत्ति शरणागति या भगवत्कृपावलम्बन को ही परम साधन या उपाय कहा है । प्रभु कृपा पर ही अवलम्बित रहना ही मन्त्र का अनुसंधानार्थ है ।
इति राग सोरठ का पं. आत्मारामस्वामीकृत भाषानुवाद समाप्त ॥१९॥
(क्रमशः)

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