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*काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।*
*दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥*
*काया मांही भय घणा, सब गुण व्यापैं आइ ।*
*दादू निर्भय घर किया, रहे नूर में जाइ ॥*
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*साभार : @Subhash Jain*
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यह तो जिंदगी का सिर्फ उपहास है जिसे हम जिंदगी कह रहे हैं यह तो जिंदगी का र्सिफ् ढोंग है जिसे हम जिंदगी कहते हैं । यह तो जिंदगी का सिर्फ एक सपना ।
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काँटों को देखकर मत रुक जाना; पूछना हो जिंदगी का राज, फूलों से पूछना । मरनेवालों से मत पूछना, पूछना हो राज़ तो उनसे पूछना जिन्हें अमृत का कुछ अनुभव हुआ है । जिंदगी का राज़ पूछना हो तो हँसते हुए फूल से पूछना । उसे पता है मौत के बीच हँसने की कला । चारों तरफ मौत घिरी है और फूल है मुस्कुराए चला जाता है । चारों तरफ मौत धिरी है और दिया है कि जला चले जा रहा है ।
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चारों तरफ मौत तो सबके घिरी है—तुम्हारे, मेरे, बुद्ध के, कृष्ण के, क्राइस्ट के; लेकिन तुम मौत से घबड़ा रहे हो और बुद्ध मौत से नहीं घबड़ा रहे हैं, इतना ही फर्क है । तुम्हारी घबड़ाहट में तुम मौत से दबे जा रहे हो । बुद्ध निर्भय होकर मृत्यु को देख रहे हैं—जो होना है होना है, जैसा होना है वैसा होना है, जैसा हो वैसा हो, ज्यों का त्यों ठहराया । बस इसी क्षण तुम्हारे भीतर एक स्वर पैदा होता है जो शाश्वत का है, एक किरण उतरती है जो परमात्मा की है ।
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हँसने का राज़ क्या है ? हँसने का एक ही राज़ है—मौत का स्वीकार । संन्यासी ही हँस सकता है । तुम्हें पता है क्यों इस देश ने संन्यास के लिए गैरिक वस्त्र चुने ? वह अग्नि का रंग है, लपटों का रंग है । प्राचीन समय में जब किसी को संन्यास देते थे, तो उसे चिता बनाकर उस पर लिटाते थे । फिर चिता में आग लगाते थे और घोषणा करते थे कि तू अब तक जो था, समाप्त हो गया । तेरी तरह तू मर गया ।
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अब उठ और एक नए जीवन में उठ ! जलती चिता से संन्यासी उठता था, फिर उसे नया नाम देते थे, और गैरिक वस्त्र देते थे ताकि याद रखना अग्नि को, लपटों को, मृत्यु को; स्मरण रखना कि जो भी मरणधर्मा है वह तू नहीं है; स्मरण रखना कि जो भी मरेगा, वह तू नहीं है ।
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गर्दन कट जाए तो झंझट मिटे । फिर भय भी मिट जाएगा । जब कट ही गयी, तो कटने को कुछ और बचा नहीं । जब तक है, तब तक भय है । भय के ऊपर उठो ।
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ओशो
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