सोमवार, 27 मार्च 2023

*नरेन्द्रादि भक्तों के साथ कीर्तनानन्द में*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*मैं ही मेरे पोट सिर, मरिये ताके भार ।*
*दादू गुरु प्रसाद सौं, सिर तैं धरी उतार ॥*
*मेरे आगे मैं खड़ा, ता तैं रह्या लुकाइ ।*
*दादू प्रकट पीव है, जे यहु आपा जाइ ॥*
*दादू जीवित मृतक होइ कर, मारग मांही आव ।*
*पहली शीश उतार कर, पीछे धरिये पांव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ जीवित मृतक का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(५)नरेन्द्रादि भक्तों के साथ कीर्तनानन्द में*
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दिन के एक बजे का समय है । भोजन करके श्रीरामकृष्ण फिर बैठकखाने में आकर भक्तों के बीच में बैठे । एक भक्त पूर्ण को बुला लाये हैं । श्रीरामकृष्ण बड़े आनन्द में आकर कहने लगे, 'यह देखो, पूर्ण आ गया ।' नरेन्द्र, छोटे नरेन्द्र, नारायण, हरिपद और दूसरे भक्त श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए उनसे वार्तालाप कर रहे हैं ।
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छोटे नरेन्द्र - अच्छा, हम लोगों में स्वाधीन इच्छा है या नहीं ?
श्रीरामकृष्ण - मैं क्या हूँ - कौन हूँ, पहले इसे खोज तो लो । 'मैं' की खोज करते ही करते 'वे' निकल पड़ेंगे । 'मैं यन्त्र हूँ, तुम यन्त्री !' चीन का बना हुआ (कलवाला) पुतला चिट्ठी लेकर दूकान चला जाता है, तुमने सुना है ? ईश्वर ही कर्ता हैं । अपने को अकर्ता समझकर कर्ता की तरह काम करते रहो ।
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"जब तक उपाधियाँ हैं, तभी तक अज्ञान हैं । मैं पण्डित हूँ, मैं ज्ञानी हूँ, मैं धनी हूँ, मैं मानी हूँ, मैं कर्ता हूँ, पिता हूँ, गुरु हूँ, यह बस अज्ञान से होता है । ‘मैं यन्त्र हूँ, तुम यन्त्री हो,’ यह ज्ञान है । उस समय सब उपाधियाँ दूर हो जाती हैं । काठ के जल जाने पर फिर शब्द नहीं होता, न ताप रहता है । सब ठण्डा हो जाता है । - शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।”
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(नरेन्द्र से) "कुछ गाओ न ।"
नरेन्द्र - घर जाऊँगा, कई काम हैं ।
श्रीरामकृष्ण - हाँ भाई, हम लोगों की बात तुम क्यों सुनने लगे । जिसके पास पूँजी है, उसी के पीछे लोग लगे रहते हैं, और जिसके एक धोती भी साबित नहीं है उसकी बात भला कौन सुनता है ? (सब हँसते हैं)
"तुम गुहों के बगीचे तो जा सकते हो ! जब कभी मैं पूछता हूँ, 'नरेन्द्र कहाँ है ?'' - तो सुनता हूँ, 'गुहों के बगीचे में ।’ - यह बात मैं न कहता, तूने ही तो निकाली ।"
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नरेन्द्र कुछ देर चुप रहे । फिर कहा, 'बाजा नहीं हैं, कैसे गाऊँ ?’
श्रीरामकृष्ण - हमारी जैसी हालत ! - इसी में रहकर गा सको तो गाओ । इस पर बलराम का बन्दोबस्त ।
"बलराम कहता है, 'आप नाव पर ही कलकत्ता आया कीजिये, अगर कभी न बने तभी गाड़ी से आया कीजिये ।'
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(सब हँसते हैं) देखते हो, आज उसने खिलाया है, इसीलिए आज तीसरे पहर भर हम सबों को कसकर नचायेगा । (हास्य) यहाँ से एक दिन उसने गाड़ी की - बारह आने में ! मैंने पूछा, 'क्या बारह आने में दक्षिणेश्वर तक गाड़ी जायेगी ?' उसने कहा, 'हाँ, ऐसा होता है ।' रास्ते में जाते जाते गाड़ी का कुछ हिस्सा ही अलग हो गया !
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(उच्च हास्य) घोड़ा भी बीच-बीच में पैर अड़ाता था । किसी तरह चलता ही न था, गाड़ीवान जब कसकर चाबुक मारता था तब घोड़े के पैर उठते थे । इधर राम खोल बजायेगा और हम लोग नाचेंगे - राम को ताल का भी ज्ञान नहीं है । (सब हँसे) बलराम का यह भाव है, - आप लोग गाइये, बजाइये, नाचिये और मौज कीजिये !" (सब हँसते हैं)
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घर से भोजन कर क्रमश: भक्तगण आते जा रहे हैं ।
महेन्द्र मुखर्जी को दूर से प्रणाम करते हुए देखकर श्रीरामकृष्ण उन्हें प्रणाम कर रहे हैं - फिर सलाम किया । पास के एक नवयुवक भक्त से कह रहे हैं, "उसे बताओ कि इन्होंने सलाम किया - वह 'अल्काट' 'अल्काट' (थिऑसफी के एक महात्मा) ही रटता है ।"
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गृही भक्तों में से अनेकों ने अपने घर की स्त्रियों को भी साथ लाया है - वे श्रीरामकृष्ण के दर्शन करेंगी और रथ के सामने श्रीरामकृष्ण का कीर्तनानन्द देखेंगी । राम और गिरीश आदि भक्त भी आ गये हैं । नवयुवक भक्त भी बहुतसे आ गये हैं ।
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नरेन्द्र गाने लगे –
"वह प्रेम का संचार और कितने दिनों में होगा ?"
बलराम ने आज कीर्तन का बन्दोबस्त किया है - वैष्णवचरण और बनवारी का कीर्तन है । वैष्णवचरण ने गाया - "ऐ मेरी रसने, सदा दुर्गा-नाम का जप कर ।”
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गाने का कुछ अंश सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये । खड़े होकर समाधिस्थ हुए थे - छोटे नरेन्द्र पकड़े हुए हैं । मुख पर हास्य की रेखा प्रकट हो गयी । कमरे भर के भक्त आश्चर्यचकित हो देख रहे हैं । स्त्रियाँ चिक के भीतर से श्रीरामकृष्ण की यह अवस्था देख रही हैं ।
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नाम जपते जपते बड़ी देर के बाद समाथि छूटी । श्रीरामकृष्ण के आसन ग्रहण करने पर वैष्णवचरण ने फिर गाया –
“ऐ विणे, तू हरिनाम कर ।”
अब एक दूसरे कीर्तनिये बनवारी 'रूप' गा रहे हैं । परन्तु वे गाते ही गाते ‘आहा हा, आहा हा’ कहकर भूमिष्ठ होकर प्रणाम करने लगते हैं । इससे कोई श्रोता हँसते हैं, किसी को विरक्ति होती है ।
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पिछला प्रहर हो आया । इस समय बरामदे में श्रीजगन्नाथदेव का वही छोटा रथ ध्वजा-पताकाओं से सुसज्जित करके लाया गया है । श्रीजगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम चंदन-चर्चित तथा वसन-भूषण और पुष्पमालाओं से सुशोभित हैं । श्रीरामकृष्ण बनवारी का कीर्तन छोड़कर बरामदे में रथ के सामने चले गये । साथ साथ भक्तगण भी गये ।
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श्रीरामकृष्ण ने रथ की रस्सी पकड़ जरा खींचा, फिर रथ के सामने भक्तों के साथ नृत्य और कीर्तन करने लगे । छोटे बरामदे में रथ चलने के साथ ही कीर्तन और नृत्य हो रहा है । उच्च संकीर्तन और खोल का शब्द सुनकर बहुतसे बाहर के लोग वहाँ आ गये । श्रीरामकृष्ण भगवत्प्रेम से मतवाले हो रहे हैं । भक्तगण प्रेमोन्मत्त हो साथ-साथ नाच रहे हैं ।
(क्रमशः)

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