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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२९. संजीवन कौ अंग १/४*
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रांम नांम की देह करि, रांम नांम ल्यौ लाइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, सोई सरूप रहि जाइ ॥१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस देह को राममय कर राम नाम में लीन हो तो फिर जीव राम स्वरूप मय हो जाता है ।
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रूप नहीं सौ रूप रहै, रहै सो कदे२ न जाइ ।
कहि जगजीवन जाइ सो, प्रांण गहे पछिताइ ॥२ ।
{२. कदे=कदापि (कभी भी)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो रुप हो वह न रहे उसमे परम का स्वरूप दिखे वह रुप है । वह फिर कभी नहीं जाता है जो स्वरूप चला जाये वह फिर जब तक प्राण रहे पछतावा ही रहता है ।
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साहिब जी मंहि साध है, सहज सुंनि कर सीर ।
कहि जगजीवन मिलि रहै, ज्यूं मिस्री गलि नीर ॥३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा को साधु बहुत प्रिय हैं । वे बिल्कुल शून्य होकर अंहकार, विषयीदोष, मिटाकर रहते हैं । तभी प्रभु उन्हें अपनाते हैं । वे प्रभु संग यो मिलकर रहते हैं जैसे मिश्री पानी में घुलकर रहती है ।
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साहिब जी मंहि साध हैं, साधन मांही रांम ।
कहि जगजीवन रांम मंहि, निज जन सुमिरैं नांम ॥४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु प्रिय साधु है, वह साधन करने से प्रभु है । संत कहते हैं कि प्रभु मय होकर भक्त जन राम नाम स्मरण करते हैं ।
(क्रमशः)

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