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*सेवा सुकृत सब गया, मैं मेरा मन मांहि ।*
*दादू आपा जब लगै, साहिब मानै नांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*जीव गोस्वामी की पद्य टीका*
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*इन्दव-*
*ग्रंथ रचे बहु ग्रंथिन छेदक,*
*आत जितो धन ले जल डारै।*
*सेव करें जन पात्र न दीसत,*
*मैं जु करूं कटु कोप उचारै ॥*
*गौरव संत बढ़ाय सिखावत,*
*बोलत मिष्ठ निशा दिन सारै।*
*कौन करै निरवेद निरूपण,*
*भक्ति चरित्र करे सु अपारै ॥३२२॥*
आपने अनेक ग्रंथों की रचना की है, जो हृदय की संशय रूप दृढ़ ग्रंथियों को भली भांति काटने वाले हैं। आपके पास भक्तों की भेट आदि के रूप में जितना धन आता था, वह सब आदर पूर्वक लेकर आप यमुनाजी के जल में डाल देते थे। यह देखकर शिष्य सेवकों ने धन को साधु- सेवा में लगाने की बारंबार प्रार्थना की।
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तब आपने कहा-साधु-सेवा करने योग्य कोई पात्र तुम लोगों में दिखाई नहीं देता है। एक ने कहा- मैं भली भांति साधु-सेवा करूँगा। वह आज्ञा लेकर संतों की सेवा करने लगा। कुछ काल के बाद एक दिन एक संत ने कुसमय में भोजन माँगा। तब सेवा करने वाले ने क्रोधित होकर उनको कटु वचन कहे।
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यह सुनकर जीव गोस्वामीजी ने उसको बहुत समझाया और कहा—मैं इसीलिये कहता था कि-साधु-सेवा अति कठिन है। फिर सन्तों की महिमा अधिक रूप से कहते हुये शिक्षा दी कि सब दिन रात मधुर वचन ही बोला करो।
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आपके वैराग्य का निरूपण कौन कर सकता है? आपने अपने ऐश्वर्य से परिपूर्ण घर का त्याग करके वृन्दावन में निवास किया था। आप नारी का तो दर्शन भी नहीं करते थे। यह प्रण तो आपका मीराँ जी ने छुड़ा दिया था। वह प्रसंग मीराँजी की कथा में आ गया है। आपने भक्ति सम्बन्धी जो चरित्र तो करे हैं वे अपार हैं। आप अपने एक कृपापात्र को कुटिया सौंपकर वृन्दावन की कुञ्जों में प्रेम से उन्मत्त होकर घूमा करते थे। जीव गोस्वामी महान् दार्शनिक पंडित, भक्ति योग के पूर्ण मर्मज्ञ, महात्मा, योगी, विरक्त और पूर्ण भक्त थे। शाके १५४० आश्विन शुक्ला तृतीया को पचासी वर्ष की अवस्था में आप हरि धाम को पधार गये थे ।
(क्रमशः)

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