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*दक्षिण जात पश्छिम कैसे आवै,*
*नैन बिन भूल बाट कित पावै ॥*
*विष वन बेलि, अमृत फल चाहै,*
*खाइ हलाहल, अमर उमाहै ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद ३२५)
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग केदार ८(संध्या ६ से ९ रात्रि)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१२९ नाम बिना उद्धार नहीं। कहरवा
भजन बिन भूल पर्यो संसार,
पच्छिम काम जात पूरब दिश्शि, हिरदै नहीं विचार ॥टेक॥
बांछे अधर१ धरे२ सौं लागे, भूले मुग्ध३ गँवार४ ।
खाय हलाहल५ जीयो चाहै, मरत न लागे बार ॥१॥
बैठे शिला समुद्र तिरन को, सो सब बूडणहार ।
नाम बिना नाहीं निस्तारा, कबहु न पहुँचे पार ॥२॥
सुख के काज धसे६ दीरघ७ दु:ख, ताकी सुधि नहिं सार ॥
जन रज्जब यूं जगत विगूचे८, इस माया की लार ॥३॥१०॥
नाम चिन्तन बिना उद्धार नहीं होता यह कह रहे हैं -
✦ संसार के प्राणी नाम चिन्तन को छोड़ कर भ्रम में पड़ रहे हैं, हृदय में विचार न होने के कारण इनकी स्थिति ऐसी है कि - जैसे किसी मनुष्य का कार्य तो पच्छिम दिशा में हो और वह जाय पूर्व दिशा में,
✦ वैसे ही प्राणी चाहते तो ब्रह्म१ को हैं और लगे हुये हैं माया२ की सेवा में । इस प्रकार अज्ञानी४ मूर्ख३ भ्रम में पड़ रहे हैं । जो मनुष्य तीव्र५-विष खाकर जीना चाहता है, उसे मरते तो कुछ भी देर नहीं लगेगी ।
✦ वैसे ही जो नाम का चिंतन न करके मुक्त होना चाहता है, उसे संसार दु:ख में पड़ते हुये भी देर नहीं न लगेगी। समुद्र को तैरने के लिये जो शिला पर बैठ कर समुद्र में उतरते हैं, वे सब डूबने वाले ही हैं । जैसे नाव बिना समुद्र से पार कभी भी नहीं हो सकते, वैसे ही नाम चिंतन बिना उद्धार नहीं हो सकता ।
✦ सांसारिक प्राणी सुख प्राप्ति के लिये महान्७ दु:ख में घुसे६ हुये हैं और जो सुख का सार साधन प्रभु का नाम है, उसका कुछ भी ज्ञान नहीं है । इस प्रकार इस माया के पीछे पड़कर जगत् के प्राणी दु:खी८ हैं ।
(क्रमशः)

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