मंगलवार, 7 मार्च 2023

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*दादू माया मांहै काढि करि, फिर माया में दीन्ह ।*
*दोऊ जन समझैं नहीं, एको काज न कीन्ह ॥*
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साभार : @Subhash Jain
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एक औरत एक रास्ते से गुजर रही है। अपने कंधे पर एक उसने पेटी ले रखी, पेटी में ऊपर बहुत से छेद हैं। राह चलते एक राहगीर ने उससे पूछा कि यह क्या है ? कुछ पेटी अनूठी-सी है और ऊपर छेद हैं। तो उस स्त्री ने कहा कि इसमें एक बिल्ली है। तो राहगीर थोड़ा और जिज्ञासु हुआ कि इस बिल्ली को किसलिये सिर पर ढो रही हो ? तो उस स्त्री ने कहा कि रात मुझे सपने आते हैं और सपनों में मुझे चूहे दिखाई पड़ते हैं। चूहों से मुझे बहुत डर लगता है। तो मेरे मनोविश्लेषक ने कहा है कि बिल्ली को पास रखना अच्छा रहेगा; इससे भय कम होगा। वह आदमी तो बहुत हैरान हुआ। उसने कहा कि सपने के चूहे तो काल्पनिक हैं।
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वह स्त्री झुकी और उस आदमी के कान में बोली, इसी तरह यह बिल्ली भी काल्पनिक है, डिब्बे में कुछ है नहीं ! काल्पनिक चूहे पकड़ने हों तो असली बिल्ली काम की है भी नहीं। असली बिल्ली कैसे झूठे चूहे पकड़ेगी! उनका मेल ही न होगा। काल्पनिक चूहे पकड़ने हों तो काल्पनिक बिल्ली चाहिये। तुम्हारा मौत का भय झूठा है। फिर जो गुरु तुम्हें मंत्र देता है कि इसको याद रखो, इससे मौत का भय कम हो जायेगा; वह इससे भी ज्यादा झूठा है। वह काल्पनिक बिल्ली है, काल्पनिक चूहों को पकड़ने के काम आती है।
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तो जो गुरु तुम्हें ताबीज देता है कि यह बांध लो, इससे तुम्हारा भय कम हो जायेगा…तुम वैसे ही एक झूठ से पीड़ित थे, उसने तुम्हें एक और झूठ पकड़ाया। इससे अस्थायी सहायता मिल भी सकती है, लेकिन कोई बुनियादी अंतर नहीं पड़ता। तुम, तुम ही रहते हो। पहले तुम एक झूठ से परेशान थे, अब दूसरे झूठ से परेशान हो। पहले डरते थे कि मौत न आ जाये! अब डरते हो कि कहीं ताबीज गंदा न हो जाये, कहीं ताबीज गिर न जाये, कहीं ताबीज भूल न जाये; क्योंकि ताबीज गया कि तुम गये। एक झूठ से दूसरा, दूसरे से तीसरा…झूठों की शृंखला पैदा हो जाती है।
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एक तो शिक्षण ऐसा है, जिसको शिक्षण कहना उचित नहीं, जो तुम्हें सांत्वना देता है। और एक शिक्षण ऐसा है, जो तुम्हें सांत्वना नहीं देता, सत्य देता है। लेकिन सत्य को पाना दुर्भर है, दूभर है। सत्य का मार्ग कठिन है। क्योंकि तुम्हें बहुत कुछ अपने भीतर काटना पड़े, बहुत कुछ अपने भीतर तोड़ना पड़े, छेनी लेकर अपने ऊपर काम करना पड़े। क्योंकि तुम इतने जुड़ गये हो जन्मों-जन्मों की धारणा के कारण, कि मैं शरीर हूं, कि इसे तोड़ने में पीड़ा होगी। तुम दीये से जुड़ गये हो, बाती से जुड़ गये हो, तेल से जुड़ गये हो। और इस दीये के साथ जोड़ ऐसा गहरा हो गया है कि तुम्हें याद भी नहीं आता कि तुम दीये से अलग भी हो सकते हो।
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तब सब सिद्धांत हैं। तब तुम कितने ही सिद्धांत पकड़ो, शास्त्र पढ़ो, यह सूत्र बंद रहेगा; इसका ताला न खुलेगा। कुछ करना पड़े। और जरूरत नहीं है कि तुम महावीर की तरह जंगल जाओ, बारह वर्ष उपवास करो तब पहचान आए। दुख बुलाने की जरूरत नहीं, दुख वैसे ही काफी है। महावीर को जरूरत पड़ी होगी। वे राजपुत्र थे, सुख में रहे थे। दुख उन्होंने जाना नहीं था इसलिये तपश्चर्या करनी पड़ी। तुमने सुख जाना ही नहीं, तुम तपश्चर्या कर ही रहे हो; सिर्फ उसका उपयोग तुम्हें पता नहीं।
*बिन बाती बिन तेल.... ओशो नमन...*

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