गुरुवार, 9 मार्च 2023

*जिनि ए सिरजे तासूं लागे*

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*सब घट आतम एक विचारे,*
*राम सनेही प्राण हमारे ॥*
*दादू साची राम सगाई,*
*ऐसा भाव हमारे भाई ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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भाइ रे ए१, बैरागी ही रहेंगे ॥
षांणां षाइ र कपड़ा पहरैं, 
अला अला ही कहेंगे ॥टेक॥
जांहिं कहूं न बुलावैं काहू, 
अैसा किया बिचारा ।
सांध संगति माहै दिन काटे, 
यूं२ तिरि उतरे पारा ॥
अवलि फकीर अलह३ सूं लागे, 
जिनि यह कुदरति कीन्हां ।
आपा४ उलटि बिचारि रु देष्या, 
तब इनि आपा चीन्हां ॥
जिनि ए सिरजे तासूं लागे, 
तो तुम्ह५ काहे दुष पाया ।
टीला गुर दादू बिधि कीन्हीं६, 
ए साहिब सूं सब७ लाया ॥३२॥
(पाठान्तर : १. ‘ए’ नहीं है, २. यौं, ३. सौं, ४. आया, ५. तुम, ६. कीनीं, ७. ‘सब’ नहीं है)
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ए भाई रे ! हम वैराग्यवृत्ति-सम्पन्न वैरागी के रूप में ही रहेंगे । हम खाना खाते हैं, कपड़े पहनते हैं और अहर्निश अल्लाह-अल्लाह=राम-राम ही कहते हैं । न कहीं जाते हैं और न किसी को बुलाते ही हैं । हमने ऐसा निश्चय किया है । हमने अपना समय साधुओं की संगति में काटा है । इस प्रकार हम सत्संगति व राम नाम स्मरण करके, भवसागर से पार उतरे हैं ।
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औलिया-फकीर, अल्लाह, जिसने यह सारा संसार बनाया है, के भजन ध्यान में लग गए हैं, लगे हुए हैं । उन्होंने आप=’देह ही आत्मा है’ सिद्धान्त पर विचार करके देखा कि यह सही है अथवा नहीं और अन्ततः उन्होंने अपने यथार्थ आपा=आत्मा रूप परमात्मा को जान लिया ।
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जिसने इनको बनाया, ये उसकी ही आराधना में लग गए । फिर तुम क्यों दुःख पा रहे हो । तुम भी परब्रह्म-परमात्मा की भक्ति में संलग्न हो जाओ । टीला कहता है, गुरुमहाराज दादूजी ने इनको परमात्मा को जानने की विधि=प्रक्रिया बता दी, इसलिए इन सभी ने अपनी वृत्ति को साहिब=परमात्मा में लगा ली है ॥३२॥
(क्रमशः)

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