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*देखत ही दिन आइ गये,*
*पलट केश सब श्वेत भये ॥*
*आई जुरा मीच अरु मरणा,*
*आया काल अबै क्या करणा ।*
*श्रवणों सुरति गई नैन न सूझै,*
*सुधि बुधि नाठी कह्या न बूझै ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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अब कुछ रांम दया करि हम कूं ।
तन मन हम सौंप्या है तुम कूं ॥टेक॥
स्यांम पलटि सेत सब आए ।
तुम्ह कूँ१ छाड़ि अवर कूं२ धाए ॥
बृध हुए कछु होइ न आवै ।
मन चंचल यहु अधिक सतावै ॥
मनसा बाचा कहूं पुकारी ।
साहिब संम्रथ लेहु उबारी ॥
गुर दादू एक तूंहि बतायौ ।
टीलौ बंदौ सरणैं आयौ ॥३१॥
(पाठान्तर : १. कौं, २. कौं)
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हे रामजी ! अब मेरे ऊपर कुछ तो दया करो । मैंने अपना तन-मन आपको समर्पित कर दिया है ॥टेक॥
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मेरे सिर के सारे काले बाल सफेद हो गए हैं । ऐसी स्थिति में अब आपको छोड़कर दूसरे किसकी शरण में जाऊँ । वृद्ध हो जाने के कारण अब तेरी शरणावलम्बन के अतिरिक्त और कुछ कर पाना भी सम्भव नहीं है । फिर मन भी अतीव चंचल है जिसके कारण वह बार-बार विषयों में भाग-भाग कर अत्यधिक सताता है ।
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मैं मनसा-बाचा आपसे पुकारकर प्रार्थना करता हूँ की हे समर्थ स्वामी ! मुझे अपनी शरण में रखकर मेरा उद्धार कर दो । गुरुमहाराज दादूजी ने एकमात्र तुझको ही समर्थ शरण्य बताया है । इसीलिए तेरा बन्दा टीला तेरी शरण में आया है ॥३१॥
(क्रमशः)

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