रविवार, 5 मार्च 2023

*२८. काल कौ अंग ९३/९६*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग ९३/९६*
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कांम गमाया धांम गमाया, नांम गमाया नींच ।
कहि जगजीवन रांम न सुमरै, ताथैं प्रगटै मींच ॥९३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे जीव उद्यम खोया, घर खोया, और हे निकृष्ट जन तूं ने नाम भी खो दिया कभी राम स्मरण नहीं किया तभी मृत्यु भय हुआ ।
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कहा बसि राखौ काम कौं, कहा बसि राखौ धाम ।
कहि जगजीवन मन बसि नांही, रसानां रटै न रांम ॥९४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव ने कहां ? काम को वश में कर रखा है कहाँ घर वश में रहा है ? ये सब छूट जाते हैं । संत कहते हैं कि जब मन ही वश में नहीं है तो जिह्वा कैसे राम कहेगी वह नहीं कह सकती है ।
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कहि जगजीवन ए मरी, काम क्रोध अहंकार ।
रांम न सुमरैं दोजगी७, अंत पड़ै मुख छार८ ॥९५॥
{७. दोजगी=दोजखी(पापी)} (८. छार=धूल)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि काम क्रोध व अहंकार को मारें । हे पापी जीव राम नाम का स्मरण क्यों नहीं करता न करने से अंत में मुख मलिन या मुहं पर धूल ही पड़ती है अपमान ही सहना पड़ता है ।
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कहि जगजीवन ए मरी, हरि बिन संसै साल ।
रांम भगति बिन दूसरा, ए सब खाली ख्याल१ ॥९६॥
(१. ख्याल=मिथ्या संकल्प-विकल्प)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि ये मरना ही है जो प्रभु नाम के बिना जीव दुख पाता है । राम भक्ति के बिना और कुछ सोचना भी मात्र ख्याल ही है ।
(क्रमशः)

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