शुक्रवार, 24 मार्च 2023

*वाराणसी में शिव तथा अन्नपूर्णा दर्शन*

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*सब तज गुण आकार के,*
*निश्‍चल मन ल्यौ लाइ ।*
आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहै समाइ ॥ *
*(#श्रीदादूवाणी ~ लै का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(४)वाराणसी में शिव तथा अन्नपूर्णा दर्शन*
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दिन के दस बजे का समय हो गया । श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं । मास्टर ने गंगा-स्नान करके श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया और उनके पास बैठे ।
श्रीरामकृष्ण भाव के पूर्णावेश में कितनी ही बातें कह रहे हैं । बीच बीच में दर्शन की गुह्य बातें कह रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण - मथुरबाबू के साथ मैं वाराणसी गया था । मणिकर्णिका के घाट से हमारी नाव जा रही थी; एकाएक मुझे शिव के दर्शन हुए । मैं नाव के एक सिरे पर खड़ा हुआ समाधिमग्न हो गया । मल्लाह हृदय से कहने लगे, 'अरे ! पकड़ो !' उन्होंने सोचा, मैं कहीं गिर न जाऊँ । देखा, शिव मानो संसार की कुल गम्भीरता लिए हुए खड़े हैं । पहले मैंने उन्हें दूर खड़े हुए देखा था, फिर मेरे पास आने लगे और मेरे भीतर विलीन हो गये ।
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"भावावेश में मैंने देखा, एक संन्यासी मेरा हाथ पकड़कर मुझे लिए जा रहा है । एक ठाकुर-मन्दिर में मैं घुसा, वहाँ सोने की अन्नपूर्णा देखी ।
"वे ही यह सब हुए हैं, - किसी किसी वस्तु में उनका प्रकाश अधिक है ।
(मास्टर से) "तुम लोग शायद शालग्राम में विश्वास नहीं करते – इंग्लिशमैन भी नहीं करते । तुम लोग मानो चाहे न मानो, कोई बात नहीं । शालग्राम अगर सुलक्षणयुक्त हों - उनमें अच्छे चक्र आदि हों - तभी ईश्वर के प्रतीक रूप में उनकी पूजा हो सकती है ।"
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मास्टर - जी, जैसे उत्तम लक्षणवाले मनुष्य के भीतर ईश्वर का प्रकाश अधिक है ।
श्रीरामकृष्ण - नरेन्द्र पहले इन सब बातों को मन की भूल कहा करता था, अब सब मानने लगा है ।
ईश्वर-दर्शन की बातें कहते हुए श्रीरामकृष्ण को भाव की अवस्था हो रही है । धीरे-धीरे आप भाव-समाधि में लीन हो गये । भक्तगण चुपचाप एकटक दृष्टि से देख रहे हैं । बड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण ने भाव को रोका और फिर बातचीत करने लगे ।
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श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) - मैं देख रहा था, ब्रह्माण्ड एक शालग्राम है । उसके भीतर तुम्हारी दो आँखें देख रहा था ।
मास्टर और भक्तगण यह अद्भुत और अश्रुतपूर्व दर्शन आश्चर्यचकित होकर सुन रहे हैं । इसी समय एक और बालक-भक्त सारदा आये और श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया ।
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श्रीरामकृष्ण (सारदा से) - तू दक्षिणेश्वर क्यों नहीं आता ? मैं जब कलकत्ता आया करता हूँ, तो तू दक्षिणेश्वर क्यों नहीं आता ?
सारदा - मुझे खबर नहीं मिलती ।
श्रीरामकृष्ण - अब तुझे ख़बर दूँगा । (मास्टर से, सहास्य) लड़कों की एक फेहरिस्त तो बनाओ । (मास्टर और भक्त हँसते हैं)
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सारदा - घरवाले विवाह कर देना चाहते हैं । ये (मास्टर) विवाह की बात पर कितने ही बार मना कर चुके हैं ।
श्रीरामकृष्ण - अभी विवाह क्यों ?
(मास्टर से) "सारदा की अच्छी अवस्था हो गयी है, पहले संकोच का भाव था, अब मुख पर आनन्द आ गया है ।"
श्रीरामकृष्ण एक भक्त से पूछ रहे हैं - "तुम क्या एक बार पूर्ण को ले आओगे ?"
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नरेन्द्र आये । श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्र को जलपान कराने के लिए कहा । नरेन्द्र को देखकर श्रीरामकृष्ण को बड़ा आनन्द हो रहा है । नरेन्द्र को खिलाकर मानो वे साक्षात् नारायण की सेवा करते हैं । उनकी देह पर हाथ फेरकर उन्हें प्यार कर रहे हैं । गोपाल की माँ कमरे के भीतर आयी । श्रीरामकृष्ण ने बलराम से कामारहाटी आदमी भेजकर गोपाल की माँ को ले आने के लिए कहा था । इसीलिए वे आयी हुई हैं । कमरे के भीतर आते ही गोपाल की माँ कह रही हैं, 'मारे आनन्द के मेरी आँखों से आँसू बह रहे हैं ।’ यह कहकर श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो उन्होंने प्रणाम किया ।
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श्रीरामकृष्ण - यह क्या है, तुम मुझे गोपाल भी कहती हो और प्रणाम भी करती हो !
"जाओ, घर में कोई तरकारी बनाओ जाकर, खूब बघार देना जिससे यहाँ तक सुगन्ध आये ।" (सब हँसते हैं)
गोपाल की माँ - ये लोग(घर के लोग) क्या सोचेंगे ?
घर के भीतर जाने से पहले उन्होंने नरेन्द्र से कातर स्वर में कहा, 'भैया, मेरी बन गयी या अभी कुछ बाकी है ?"
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आज रथ यात्रा है । श्रीजगन्नाथजी के भोग आदि के होने में कुछ देर हो गयी । अब श्रीरामकृष्ण भोजन करेंगे, अन्तःपुर की ओर जा रहे हैं । भक्त-स्त्रियाँ उनके दर्शन करने के लिए उत्सुक हैं । बहुत सी स्त्रियाँ श्रीरामकृष्ण की भक्ति करती थीं । परन्तु उनकी बातें वे पुरुष भक्तों से न कहते थे ।
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कोई भक्त-स्त्री अगर किसी भक्त से पास आती-जाती थी तो वे उससे कहते थे - "उसके पास ज्यादा न जाया कर, गिर जायेगी ।” कभी कभी कहते थे, "अगर मारे भक्ति के कोई स्त्री जमीन में लोटती भी रहे तो भी उसके पास न जाना चाहिए ।" स्त्री-भक्त अलग रहेंगी – पुरुष-भक्त अलग, तभी दोनों की भलाई हैं । कभी कहते थे, "स्त्रियों के गोपाल-भाव – वात्सल्य-भाव - का अतिरेक अच्छा नहीं । उसी वात्सल्य से एक दिन बुरा भाव पैदा हो जाता है ।"
(क्रमशः)

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