🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३०४)*
*राग सोरठ ॥१९॥**(गायन समय रात्रि ९ से १२)*
.
*३०४. राज विद्याधर ताल*
*मन रे, तूँ देखै सो नाँहीं हीं, है सो अगम अगोचर मांहीं ॥टेक॥*
*निशि अँधियारी कछू न सूझै, संशय सर्प दिखावा ।*
*ऐसे अंध जगत नहिं जानै, जीव जेवड़ी खावा ॥१॥*
*मृग जल देख तहाँ मन धावै, दिन दिन झूठी आशा ।*
*जहँ जहँ जाइ तहाँ जल नाँहीं हीं, निश्चय मरै पियासा ॥२॥*
*भ्रम विलास बहुत विधि कीन्हा, ज्यों स्वप्नै सुख पावै ।*
*जागत झूठ तहाँ कुछ नाँहीं हीं, फिर पीछे पछितावै ॥३॥*
*जब लग सूता तब लग देखै, जागत भ्रम विलाना ।*
*दादू अंत इहाँ कुछ नाँहीं हीं, है सो सोध सयाना ॥४॥*
.
भादी०-हे मन ! इदं दृश्यजातं जगन्न पारमार्थिकम् मायाकल्पितत्वात् । यत्तु पारमार्थिक कूटस्थं व्योमवत्सर्वव्यापि सर्वविक्रियारहितं नित्यतृप्तं स्वयं ज्योतिर्ब्रह्म तत्तु इन्द्रियातीतं सबाह्याभ्यन्तरमस्ति न च वेदैरपि गम्यते । यथा रात्रावन्धकारे रज्जुज्ञानाभावेन तत्र मिथ्या-सर्पः प्रतीयते तथैव ब्रह्मज्ञानाद् मिध्याभूतं जगत्प्रतीयते । भ्रान्तिकल्पितसर्प दृष्टवा विभेति जीवस्तथैवाज्ञानी जीवो विवर्तभूते जगति शत्रुमित्रादि सुखदुःखादि कल्पनया व्यथते । यथा मृगतृष्णिकायां जलं प्रकल्प्य मृग: पिपासित एव प्रियते । नहि तत्र जलकणिकाप्यस्ति । मिथ्याजलकल्पनयैवेतस्ततो धावति । यथा वा स्वप्ने स्त्रिया परिष्वन्य-मिथ्याभोगेन प्रसीदति । तथा मायिकेषु मिथ्याभोगेषु सुखार्थं जनो भ्राम्यति । न च तत्र सुर्ख लभते, मिथ्याभूतत्वात्, प्रत्युत दुखमेवोपलभ्यते । तुच्छरूपैर्दृष्टनष्टस्वरूपैर्भावैरितस्तत आकृष्यमाणा जना जगत्यां मृत्यु-चिन्तामपि न विदधति । किन्त्वदृष्ट-दृष्ट-नष्ट-प्रनष्ट-पदार्थेषु ममतां विधाय तेषां वियोगाद् व्याकुला सन्त: धिक् अस्मान: क्व गच्छाम: किं कुर्मः, इति हतभाग्या वृथैव रुदन्ति । न त्वात्मज्ञानाय यतन्ते, येन सुखिनो भवेयुः । अतो हे मन: ! तदेव ब्रह्म त्वया जिज्ञासितव्यम् ।
.
उक्तमध्यात्मरामायणे
इत्थं यदीक्षेत हि लोकसंस्थितो जगन्मृधैवेति विभावयन्मुनिः ।
निराकृतत्वात्युतियुक्तिमानतो यथेन्दुभेदो दिशिदिग्भ्रमादयः ॥
यावन्न पश्येदखिलं मदात्मक तावन्मदाराधनतत्परो भवेत् ।
श्रद्धालुरत्यूर्जितभक्तिलक्षणो यस्तस्य दृश्योऽहमहर्निशं हदि ॥
भातर्यदीद परिदृश्यते जगन्मायैव सर्व परिहत्य चेतसा ।
मद्भावनाभावितशुद्धमानस: सुखी भवानन्दमयो निरामयः ॥
.
हे मन ! यह दृश्य जगत् पारमार्थिक नहीं है, किन्तु मिथ्या है । क्योंकि माया से कल्पित है । जो पारमार्थिक कूटस्थ आकाश की तरह सर्वव्यापक, सब विक्रियाओं से रहित, नित्य-तृप्त, निरवयव, स्वयं ज्योति रूप ब्रह्म, वह इन्द्रियातीत है, बाहर भीतर सब जगह में है । वह तो वेदों द्वारा भी नहीं जाना जाता ।
.
जैसे रात्रि के अन्धकार में रज्जु का ज्ञान न होने से वहां पर मिथ्या सर्प की प्रतीति होती है, वैसे ही ब्रह्म ज्ञान न होने से ही मिथ्या जगत की प्रतीति होती है । भ्रान्ति से कल्पित मिथ्या-सर्प को देख कर जैसे प्राणी डरता है, वैसे ही अज्ञानी जीव इस विवर्त-भूत जगत् में शत्रु, मित्र, सुख, दुःख आदि की कल्पना से दुःखी होता है ।
.
जैसे मृग-तृष्णिका में जल की कल्पना करके मृग प्यासा ही मर जाता है, क्योंकि वहाँ पर जल है ही नहीं, केवल मिथ्या जल की कल्पना से इधर-उधर दौड़ता है । जैसे स्वप्न में स्त्री-संग से मिथ्या-भोग के द्वारा जीव प्रसन्न होता है, वैसे ही जीव मायिक भोगों में सुख के लिये दौड़ता है । लेकिन उसको सुख मिलता नहीं, मिथ्या होने से, प्रत्युत दुःख ही मिलता है ।
.
तुच्छ और नष्ट दृष्ट स्वाभाव वाले इन पदार्थों से आकृष्ट लोग संसार में मृत्यु की भी चिन्ता नहीं करते किन्तु उनमें ममता करके उनके वियोग में दुःखी होकर ‘मेरे को धिक्कार है, मैं कहां जाऊं, क्या करूं ? मैं बड़ा ही मन्द भागी हूँ’, ऐसे व्यर्थ ही रोते हैं । फिर भी आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिये चेष्टा नहीं करते । जिससे सुखी हो जायँ ।
अध्यात्म-रामायण में लिखा है कि ३. ५ । -५७ । ६० ।
.
इस संपूर्ण जगत् को अपने आत्मा के साथ अभिन्न भाव से चिन्तन करने से जीव परमात्मा के साथ अभिन्न भाव से स्थित हो जाता है । यह जो जगत् है, वह श्रुति, युक्ति और प्रमाण से बाधित होने के कारण चन्द्र भेद दिशाओं में होने वाले दिग्भ्रम के समान मिथ्या ही है, ऐसी भावना करता हुआ लोकव्यवहार में स्थित मुनि इसे देखें । जब तक सारा संसार मेरा ही रूप दिखलाई न पड़े, तब तक निरन्तर मेरी आराधना करता रहे । जो श्रद्धालु और उत्कृष्ट भक्त होता है उसे अपने हृदय में सर्वदा मेरा ही साक्षात्कार होता है ।
.
हे भाई ! यह जो जगत् दिखाई देता है, वह सब माया है । इसे अपने चित्त से निकाल कर मेरी भावना से शुद्ध चित्त और सुखी होकर आनन्द-पूर्ण और क्लेश शून्य हो जावो ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें