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*नहिं मृतक नहिं जीवता, नहिं आवै नहिं जाइ ।*
*नहिं सूता नहिं जागता, नहिं भूखा नहिं खाइ ॥*
*न तहाँ चुप ना बोलणां, मैं तैं नांहीं कोइ ।*
*दादू आपा पर नहीं, न तहाँ एक न दोइ ॥*
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*साभार : @Subhash Jain*
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तुम्हारे पास धन हो सकता है, लेकिन उससे कुछ अंतर नहीं पड़ता। तुम्हारे पास धन नहीं भी हो सकता है, उससे भी कुछ अंतर नहीं पड़ता।
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हो सकता है समाज ने तुम्हें बहुत इज्जत दि हो मान दिया हो, तुम्हारे पास बड़ी—बड़ी डिग्रियां हों, बड़े—बड़े पुरस्कार हों, प्रशंसा मिली हो, सर्टिफिकेट हों—उसका भी कोई आत्यंतिक मूल्य नहीं है....
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यह तो एक खेल है। जब तक तुम इस खेल के पार नहीं हो जाते और तुम्हें इस बात का बोध नहीं हो जाता कि *इस खेल में तुम स्वयं को कभी न खोज पाओगे, कि तुम कौन हो* ...
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तब तक समाज तुम्हें मूर्ख बनाता रहेगा और तुम्हें भ्रांत धारणाएं दिए चला जाएगा कि तुम धनी हो, विद्वान हो, हंशीयार हो, इज्जतदार हो, समझदार हो, दानी हो, दयावान हो...
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और तुम उन धारणाओं में ही आस्था और विश्वास करते हुए जीए चले जाओगे। तब तुम्हारा पूरा जीवन व्यर्थ गया।
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इसलिए जब पहली बार ध्यान सच में फलित होता है तो ध्यान तुम्हें मिटाने लगता है—तुम्हारा नाम खो जाता है, तुम्हारा धन बेकार दिखने लगता है, तुम्हारा ज्ञान सिर्फ एक जानकारी बन जाती है । इज्जत, मान सम्मान संभालना एक बोझ बन जाता है...
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तुम्हारी जाति मिट जाती है, तुम्हारा तथाकथित धर्म बिदा हो जाता है, तुम्हारी राष्ट्रीयता समाप्त हो जाती है— धीरे — धीरे व्यक्ति अपनी विशुद्ध निर्विकार एकांत में नग्न और अकेला रह जाता है।
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शुरू में थोड़ा भय भी लगता है, क्योंकि पैर जमाकर खड़े होने के लिए कहीं कोई जगह नहीं मिलती और न ही अहंकार को टिके रहने के लिए कोई जगह मिलती है। कहीं से कोई सहयोग नहीं मिलता है, उसके सभी सहारे गिर जाते हैं। और अहंकार का पुराना पूरा का पूरा ढांचा चरमरा भर गिर जाता है।तुम थोड़े भयभीत भी हो जाते है...
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जब भी ऐसा हो तो एक ओर खड़े हो जाना, और खूब जोर से हंसना और *उस ढांचे को गिर जाने देना।* और इस बात पर जोर से हंसना कि अब पीछे लौटने के लिए कहीं कोई मार्ग नहीं बचा है, पीछे लौटने का कोई उपाय शेष नहीं बचा है। *गुरजीएफ* कहता है कि इस स्थिति में, साधक को मास्टर (गुरु), स्कूल(आश्रम) की जरूरत पड़ती है...
*ओशो । (संकलित)*
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