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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२९. संजीवन कौ अंग ९/१२*
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जगजीवन जांमन मरन१, हरि भजि भरम बिलाइ ।
सकल साध जहँ रहि रह्या, तहँ मन रह्या समाइ ॥९॥
(१. जांमन मरन=जन्म मरण)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जन्म मृत्यु का संशय प्रभु भजन से मिटा दीजिये । जहाँ सभी साधुजन आनंद से रहते हैं उसी प्रभु शरण में मन समाये रखें ।
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देह बिसरजन२ आतमां, गुण तजि आगै जाइ ।
सुरति न पाछै बाहुड़ै, काल करम नहिं ताहि ॥१०॥
{२. बिसरजन=विसर्जन(त्याग)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि देह के सभी गुण त्याग करदेह भाव छोड़़ दें कि यह मेरी है । फिर कभी ध्यान पलट कर इसमें आये ही नहीं तो जीव काल कर्म से मुक्त होता है ।
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हरि भजि आवरदा३ बधै, रांम सुमरि बच मींच ।
(कहि) जगजीवन म्रितक जिवै, अमर अमीरस सींच ॥११॥
(३. आवरदा=आयु)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हरि स्मरण से आयु बढती है राम स्मरण से मृत्यु भय मिटता है । ऐसी स्थिति में जीव अंहकार रहित हो अमर हो अमृत्व से सिंचित होता है ।
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अम्रित नांम अलेख का, सदा संजीवनि सोइ ।
कहि जगजीवन रांम हरि, भजतां होइ सो होइ ॥१२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु का नाम अमृत है । वह सदा संजीवनी जैसा है जो जीव को जगाये रखता है । संत कहते हैं कि स्मरण करने से अगर कुछ हो तो होता रहे संत परवाह नहीं करते हैं ।
(क्रमशः)

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