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आत्मा राम है, राम है आत्मा,
ज्योति है युक्ति सौं करो मेला ।
तेज है सेज है, सेज है तेज है,
एक रस दादू खेल खेला ॥
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संत टीला पदावली
संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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बाबा मोहन आयौ हो ॥
आग्याकारी साध थौ, थां बेगि बुलायौ हो ॥टेक॥
पद लिखतौ साषी लिखी, अर अरथ बिचार्यौ हो ।
तुम्ह हीं सौं सनमुख रह्यौ, और सबै निवार्यौ हो ॥
हांजी हांजी हीं कियौ, नांहीं कदै न भाष्यौ हो ।
मनसा बाचा करमना, चित तुम सौं राष्यौ हो ॥
मोहन माया तजि गयौ, होइ रह्यौ निवारौ हो ।
‘टीला’ राम षुसी हुवौ, यौं लागै प्यारौ हो१ ॥४०॥
(पाठान्तर : १. यह पंक्ति नहीं है)
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मोहन बाबाजी इस धराधाम पर पधारे । वे गुरुमहाराज के आज्ञाकारी साधु शिष्य थे किन्तु हे परब्रह्म-परमात्मा ! आपने उनको अपने पास बहुत जल्दी ही बुला लिया ।
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वे पद लिखा करते थे । उन्होंने साषियाँ भी लिखीं और गुरुमहाराज के पद साषियों के अर्थों का विचार भी करते थे । वे सदैव तुमसे ही सन्मुख रहे, सदैव आपके ही अनन्यभक्त बने रहे । उन्होंने आपके अतिरिक्त अन्य सभी का परित्याग कर दिया था ।
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वे सदैव ‘हाँ जी’, ‘हाँ जी’ ही कहा करते थे । उन्होंने कभी भी ‘नहीं’ शब्द का उच्चारण ही नहीं किया । मनसा-वाचा-कर्मणा सदैव चित्तवृत्ति आपमें ही लगाकर रखी ।
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अब मोहन बाबाजी शरीर त्यागकर चले गए हैं । वे हमसे अलग हो गए हैं । (शरीरेण अलग हुए हैं । आत्मरूपेण तो अलग होने का प्रश्न ही नहीं) टीला कहता है, मोहन बाबाजी को रामजी अपने पास बुलाकर आनन्दित है क्योंकि ये उसको प्रिय लगते हैं ॥४०॥
(क्रमशः)
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