मंगलवार, 14 मार्च 2023

*श्रीरामकृष्ण की भावावस्था*

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*हरि चिन्तामणि चिन्ततां, चिंता चित की जाइ ।*
*चिंतामणि चित में मिल्या, तहँ दादू रह्या लुभाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*श्रीरामकृष्ण की भावावस्था*
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लगभग छ: बजे का समय है । गिरोश के भाई अतुल और तेजचन्द्र के भाई आये हुए हैं । श्रीरामकृष्ण भाव-समाधि में मग्न हैं । कुछ देर बाद भावावेश में कह रहे हैं - "चैतन्य की चिन्ता करके क्या कोई कभी अचेतन होता है ? - ईश्वर की चिन्ता करके क्या कभी किसी को मस्तिष्क-विकार हो सकता है ? - वे बोधस्वरूप जो हैं - नित्य, शुद्ध और बोधरूप ।"
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आये हुए लोगों में से कोई कोई सोचते रहे होंगे कि ईश्वर की चिन्ता करके लोग पागल हो जाते हैं - शायद इन्हें भी कोई मस्तिष्क-विकार हो गया है ।
श्रीरामकृष्ण कृष्णधन नाम के उसी रसिक ब्राह्मण से कह रहे हैं – “साधारण – से ऐहिक विषय को लेकर तुम दिनरात मजाक कर-करके समय क्यों बिता रहे हो ? उसी को ईश्वर की ओर लगा दो । जो नमक का हिसाब लगा सकता है, वह मिश्री का भी लगा लेता है ।"
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कृष्णधन - (हँसकर) - आप खींच लीजिये ।
श्रीरामकृष्ण - मैं क्या करूँगा, सब तुम्हारी ही चेष्टा पर अवलम्बित है । ‘यह मन्त्र नहीं, - अब मन तेरा है ।’
"उस साधारण-सी रसिकता को छोड़कर ईश्वर की ओर बढ़ जाओ । आगे एक से एक बढ़कर चीजें मिलेंगी । ब्रह्मचारी ने लकड़हारे से बढ़ जाने के लिए कहा था । उसने बढ़कर देखा, चन्दन का वन था - फिर चाँदी की खान थी, और फिर आगे बढ़कर सोने की खान, - फिर हीरे और मणि की खानें ।"
कृष्णधन - इस मार्ग का अन्त नहीं है ।
श्रीरामकृष्ण - जहाँ शान्ति हो, वहीं रुक जाओ ।
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श्रीरामकृष्ण एक आये हुए व्यक्ति के सम्बन्ध में कह रहे हैं –
"उसके भीतर कोई वस्तु मुझे नहीं दीख पड़ी, जैसे जंगली बेर ।"
शाम हो गयी । कमरे में दिया जला दिया गया । श्रीरामकृष्ण जगन्माता की चिन्ता करते हुए मधुर स्वर से उनका नाम ले रहे हैं । भक्तगण चारों ओर बैठे हुए हैं ।
कल रथ-यात्रा है । आज श्रीरामकृष्ण यहीं रहेंगे ।
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अन्तः पुर से कुछ जलपान करके श्रीरामकृष्ण फिर बड़े कमरे में आये । रात के दस बजे होंगे । श्रीरामकृष्ण मणि से कह रहे हैं - उस कमरे से अँगौछा तो ले आओ ।
उसी छोटे कमरे में श्रीरामकृष्ण के सोने का प्रबन्ध किया गया है । रात के साढ़े दस का समय हुआ । श्रीरामकृष्ण शयन करने के लिए गये ।
गरमी का मौसम है । श्रीरामकृष्ण ने मणि से पंखा ले आने के लिए कहा । मणि पंखा झल रहे हैं । रात के बारह बजे श्रीरामकृष्ण की नींद उचट गयी, कहा, 'पंखा बन्द कर दो, जाड़ा लग रहा है ।'
(क्रमशः)

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