शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

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*सब काहू के होत हैं, तन मन पसरैं जाइ ।*
*ऐसा कोई एक है, उलटा मांहिं समाइ ॥*
*क्यों करि उलटा आनिये, पसर गया मन फेरि ।* 
*दादू डोरी सहज की, यों आनै घर घेरि ॥*
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साभार : Subhash Jain
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ओशो के होने से यह दुनिया सम्मानित हुई है...🌺
पद्म विभूषण, अमृता प्रीतम (लेखिका एवं कवयित्री)
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जब भी मैं ओशो की बात करती हूं लगता है कि खामोशी की ओर एक संकेत भर हो पाया है, इससे अधिक कुछ नहीं हुआ। खामोशी का अनुवाद नहीं होता, यह सिर्फ उसकी गाथा है जो कुछ-कुछ अनुवाद में उतरती है और अंतर अनुभव का संकेत सा बनती चली जाती है। इसलिए गाथा की अहमियत आज भी है और हर काल में बनी रहेगी।
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सिर्फ इतना भर कहना है कि ओशो - गाथा को पढ़ने वाले अक्षरों के अंतराल में धड़कती हुई खामोशी को भी सुन लें। मैं समझती हूं कि ओशो हमारे युग की एक बहुत बड़ी प्राप्ति है, जिन्होंने सूरज की किरण को लोगों के अंतर की ओर मोड़ दिया, और सहज मन से उस संभोग की बात कह पाए जो एक बीज और किरण का संभोग है और जिससे खिले हुए फूल की सुगंध इंसान को समाधि की ओर ले जाती है, मुक्ति की ओर ले जाती है, मोक्ष की ओर ले जाती है।
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मानना होगा कि ओशो ही यह पहचान दे सकते थे, जिन्हें चिंतन पर भी अधिकार है और वाणी पर भी अधिकार है। ओशो एक अकेला नाम है, सदियों में अकेला नाम, जिसने दुनिया को भय मुक्त होने का संदेश दिया।
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कुछ लोग होते हैं- चिंतन, कला या विज्ञान के क्षेत्र में, जो प्रतिभाशाली होते हैं, और कभी-कभी यह दुनिया उन्हें सम्मानित करती है, लेकिन रजनीश अकेले हैं, बिलकुल अकेले. जिनके होने से यह दुनिया सम्मानित हुई, यह देश सम्मानित हुआ।
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से ओशो ने कहा है- 'मुझे कभी 'था' कहकर याद नहीं करना, 'मैं हं' और काया के भार मुक्त होकर मेरा अस्तित्व आपको पहले से भी ज्यादा अनुभव होगा।' मानना होगा कि, सत्य o 'था' नहीं होता। 'वो है' और 'वो था' इसके बीच का फासला सिर्फ दुनिया वाले तय करते हैं, लेकिन मुहब्बत करने वाले यह फासला तय करना नहीं जानते।
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"ओशो की आवाज हवा में बहती हुई सुनाई देती है। वह बहती हुई पवन की तरह किसी के अंतर में सरसराती है, एक बादल की तरह घिरती हुई बूंद-बूंद बरसती हैं, और सूरज की एक किरण होकर कहीं अंतर्मन में उतरती है तो कह सकती हूं, वहां चेतना का सोया हुआ बीज पनपने लगता है। फिर कितने ही रंगों का जो फूल खिलता है उसका कोई भी नाम हो सकता है। वो बुद्ध होकर भी खिलता है, महावीर होकर भी खिलता है, और नानक होकर भी खिलता है।
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● ओशो का चिन्तन जिस गहराई में उतरता है, वहां किसी दूसरे के लिए कहने को कुछ नहीं बचता। मैं मानती हूं कि हर चिन्तनशील साधक के लिए, हर बना हुआ रास्ता संकरा होता है। अपना रास्ता तो उसे अपने पैरों से बनाना होता है। लेकिन श्री रजनीश इस रहस्य को सहज मन से कह पाए, इसके लिए हमारा युग इन्हें धन्यवाद देता है। अपनी इसी चेतना की रोशनी में देखती हूं कि एक ओशो हैं, जो इस युग की आवाज बन पाए हैं।
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ओशो - गाथा सदियों तक लोगों की छाती में बहती रहेगी। हम कितना भी कुछ कहें, कितना भी सुनें, यह कहने और सुनने की सीमा में नहीं आएगी, पर अनुभव की खामोशी होगी। जो अक्षरों के अंतराल में धड़कती हर काल की रगों में चलती रहेगी।
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ओशो जब कायामय हुए तो आकाशगंगा का पानी कायामय हुआ और जब सितारों ने उस पानी से अपनी-अपनी मटकियां भर लीं तो कुछ-एक कतरे थे जो उन मटकियों से छलक गए और वही ओशो की आवाज के अक्षर हुए। और जिसने भी उन अक्षरों का स्पर्श पा लिया वह अपने अंतर के अनुभव में उतर गया। अंतर का अनुभव सिर्फ एक ही भाषा जानता है- खामोशी की। मैं कितना भी कुछ कहूं वह मेरी उस खामोशी को छूकर गुजर जाता है, और खामोशी के कण मेरी कलम में नहीं उतरते। 
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मैं समझती हूं ओशो दुनिया के सबसे बड़े साहित्यकार है। साहित्य जिंदगी के लिए है, जिंदगी के उत्सव के लिए है। ओशो से बड़ा जिंदगी को सेलीब्रेट करने वाला आदमी नहीं है। साहित्य में ओशो जहां पहुंचे हैं वहां कोई नहीं पहुंचा। जहां मीरा के नृत्य और बुद्ध के मौन का संगम होता है, वहां रजनीश का वास्तविक दर्शन पुष्पित- पल्लिवत होता है। ओशो स्वयं तूफानों के पाले हुए थे और उनका अक्षर-अक्षर मुहब्बत का दीया बनकर उन तूफानों में जलता रहा... जलता रहेगा ।
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ओशो धर्म की अंर्तध्वनि हैं- दिल की मिट्टी में जब किसी का नाम अंकुरित हो जाता है, जब उसकी पहचान पनप जाती है, तो पेड़ की शाखा कट जाने से भी पेड़ की जड़ सलामत रहती है। जहां चिंतन का बोर उसी तरह पड़ता है, अनुभव की पत्तियां उसी तरह पनपती है और खामोशी की सुगंधि उसी तरह उठती है। इसलिए कह सकती हूं कि जिसने भी ओशो को पाया है, उसके लिए ओशो कभी 'था' नहीं हो सकता। 'वो हैं', उस हवा में हैं, जिसमें हम सांस लेते हैं। 
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रोज कुछ न कुछ पढ़ने की आदत है, इसलिए जिस भी किताब को मैं हाथ में लेती थी, कुछ ही पन्ने पलटने के बाद उकताकर छोड़ देती थी। सामने जो जलता हुआ सवाल था, उसका जवाब कहीं से नहीं मिल पा रहा था। उस वक्त रजनीश का चिंतन सामने आया कि जिस दिन कोई सियासतदान लोगों के पास वोट मांगने नहीं जाएगा और जिस दिन लोग किसी चिंतनशील और कर्मशील व्यक्ति के पास वोट देने के लिए आएंगे, एक आरजू लेकर कि देश की खातिर आपको यह जिम्मेदारी लेनी होगी, उस दिन सियासत की आत्मा जाग उठेगी।
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यह एक बहुत बड़ी संभावना थी, जिसकी ओर रजनीश संकेत कर रहे थे और मैं सोच रही थी कि वह संभावना सिर्फ उस दिन सामने आ सकती है, जब सियासत सत्ता ऑरिएंटेड नहीं होगी, वो कार्य-ऑरिएंटेड हो जाएगी, मकसद-ऑरिएंटेड हो जाएगी और मन की इसी हालत में मैं रजनीश को पढ़ने लगी और मन को एक राहत मिलती गई, एक तसकीन मिलती गई। समाज का वो तसव्वुर सामने आता गया, जो एक-एक इंसान के एक-एक बीज के खिले होने से जमा होता है, और एक-एक फूल की सुगंध मिलकर समाज की आत्मा बनता है।
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असल में ओशो को एक किताब नहीं, एक ग्रंथ कहना होगा। यह बहुत प्राचीन लफ्ज हैं, जब पेड़ों के पत्तों पर कुछ लिख दिया जाता था- भोज-पत्रों पर, और फिर उन पत्रों को बांध लेने का नाम ग्रंथ हुआ। और ओशो ने जो करीब सात सौ पचास किताबें लिखी हैं, कलम से नहीं आवाज से, पवन के कागज पर, उन्हीं सात सौ पचास किताबों को सात सौ पचास पृष्ठ मानकर मैं ओशो को ग्रंथ कह रही हूं। 
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आसमान के सितारे हाथों में खाली मटकियां लिए रोज आकाशगंगा तक जाते हैं और जब भरी हुई मटकियां लिए लौटते हैं तो कुछ-एक कतरे उन मटकियों से छलक जाते हैं और वही कतरे जब पृथ्वी पर गिरते हैं और जो लोग उनका स्पर्श पा लेते हैं उनमें एक चेतना जाग्रत हो जाती है। मैं इसी मिथक की रौशनी में कह सकती हूं कि इन अक्षरों से भरी हुई जितनी भी मटकियां हैं, उनमें से खामोशी के जो कतरे छलक जाएंगे, वह अंतर-अनुभव को होंगे। ओशो धर्म की अंर्तध्वनि हैं, इसलिए मैंने जो भी उन पर लिखा है- उन्हीं के नाम अर्पित करती हूं।
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हमें ओशो की आवाज एक वरदान की तरह मिली है पूरे चांद की रात जब सागर की छाती में उतर जाती है, तो अहसास की जाने कैसे इंतहा उसके पानी में लहर-लहर होने लगी है। कुछ उसी तरह की घटना होती है जब रजनीश जी की आवाज, सुनने वाले की रागों में उतरती है और अंतर्मन में जाने कितना कुछ भीगने और छलकने लगता है। 
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एक सरसराहट पैदा होती है, जब बहती हुई पवन पेड़ के पत्तों से गुजरती है। लेकिन वो सरसराहट एक टकराव से पैदा होती है। पवन के और पत्तों के टकराव से एक नदी के पास बैठ जाएं तो कलकल का एक नाद सुनाई देता है। लेकिन वो ध्वनि पानी की और चट्टान की टक्कर से पैदा है। वीणा के तार छिड़ जाएं तो वो ध्वनि हाथ के और तार के टकराव से पैदा होती है। 
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और इन सब ध्वनियों की ओर संकेत करते हुए रजनीश हमें वहां ले जाते हैं- नानक के एक ओंकार की ओर जहां हर तरह का टकराव खो गया, द्वैत खो गया। जहां शक्ति कणों ने एक आकार ले लिया: एक ध्वनि का, ओंकार की ध्वनि का । इसी को गुरु नानक ने सतनाम कहा, एक संकेत दिया जहां दुनिया के दिए हुए सभी नाम खो जाते हैं। एक ही बचता है इक ओंकार सतनाम इस ओंकार सतनाम । 
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रजनीश की आवाज में सत्ता और सत्य के अंतर में ले जाती है। जहां विज्ञान अकेले मस्तक के माध्यम से सत्य को खोजता है और कवि अकेले मन के माध्यम से सत्ता को खोजता है। मन और मस्तक अकेले-अकेले पड़ जाते हैं। और रजनीश एक संकेत बन जाते हैं नानक के उस अंतअनुभव का, जहां दोनों का मिलन होता है। विज्ञान और कला का द्वंद्व खो जाता है और इस ओंकार में प्रवेश करते हैं। 
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रजनीश जी की आवाज जब बहती हुई पवन की तरह किसी के अंतर में सरकती है, एक बादल की तरह घिरती हुई बूंद-बूंद बरसती है, और सूरज की एक किरण होकर कहीं अंतर्मन में उतरती है तो कह सकती हूं यही चेतना का सोया हुआ बीज पनपने लगता है: फिर कितने ही रंगों का जो फूल खिलता है उसका कोई भी नाम हो सकता है। वो बुद्ध होकर भी खिलता है, और नानक होकर भी खिलता है।
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आलौकिक सच्चाइयां जो दुनियावालों की पकड़ में नहीं आतीं, उन्हें कहने के लिए कुछ प्रतीक चुन लिए जाते हैं। कुछ गाथाएं जोड़ ली जाती हैं, जो सच्चाइयों की ओर एक संकेत बनकर सदियों के संग-संग चलती हैं। ये गाथाएं लोगों के अंतर में सोई हुई संभावनाओं को जगाने के लिए होती हैं। लेकिन जब संप्रदाय बनते हैं, नजर और नजरिया छोटी-छोटी इकाईयों में सीमित होता चला जाता है। तो प्रतीक रह जाते हैं, अर्थ खो जाते हैं। और लोग खाली- खाली निगाहों से हर प्रतीक को नमस्कार करते हैं। लेकिन उसी तरह उदासीन बने रहते हैं।
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रजनीश जी ने दुनिया को दिया है, वो सादे से लफ्जों में कह सकती हूं कि चेतना की क्रांति है, जो एक हर गाथा के प्रतीक को अपने पोरों से खोलती है। इक ओंकार और नानक की बात करते हैं हुए वो ऐसी कितनी ही गाथाओं की बात करते हैं- वो एक नदी में तीन दिन के लिए उतर जाने की बात हो या लालू की रोटी से दूध की धारा बहने की बात हो, या किसी नवाब के कहने पर नमाज पढ़ने की बात हो, या मक्का में हर ओर काबा के दिख जाने की बात हो। 
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रजनीश हर गाथा से गुजरते हुए अपनी आवाज से एक दिशा देते चले जाते हैं जो लोगों के भीतर में उतरती है, उनकी चेतना की सोई हुई संभावनाओं को जगाने के लिए। कोई नाम, कोई सत्य अपना नहीं होता जब तक वह अपने अनुभव की बात करते हुए मैं कह सकती हूं कि मैं जब भी नानक को समझना चाहती हूं तो देखती हूं कि रजनीश वहां खड़े हैं। मुझे संकेत से वहां ले जाते हैं। जहां नानक के दीदार की झलक मिलती है। मैं कृष्ण को समझना चाहती हूं तो पाती हूं कि सामने रजनीश हूं और फिर वो मुस्कराते से कृष्ण की ओट में हो जाते हैं। वो बुद्ध के मौन में भी छिपते हैं और मीरा की पायल में भी बोलते हैं। जपुजी की आत्मा में उतरना हो तो मैं समझती हूं कि इस काल में हमें रजनीश जी की आवाज एक वरदान की तरह मिली है जिससे हमारी चेतना का बीज इस तरह पनप सकता है कि हमारे भीतर नानक खिल जाएंगे, इस ओंकार खिल जाएगा...🌺

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