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*दादू हरि भुरकी वाणी साधु की,*
*सो परियो मेरे शीश ।*
*छूटे माया मोह तैं, प्रेम भजन जगदीश ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*इन्दव-*
*सारहु में ततसार१, शिरोतर२,*
*लीन्हो महा मथ माधौ गुसांई।*
*लीला रु जैति जपै दुख दूर हो,*
*काज सरै३ महामंत्र की नांई ॥*
*भैरव भूत प्रेत रु पाखंड,*
*व्याधि टरै बपु तैं सब वाई४।*
*राघौ कहै नित नेम निरंतर,*
*ऐसे मिले ढुरि५ सेवक सांई ॥२५८॥*
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व्यासजी के निकाले हुये शास्त्र के सार१ का भी श्रेष्ठ२ सार माधवदासजी ने महान् मन्थन द्वारा निकाल कर संग्रह कर लिया था।
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फिर लीला जैति ग्रंथ में रख दिया था। जो लीला जैति के मन्त्र जपते हैं, उनके दुःख दूर हो जाते हैं और महामन्त्र के द्वारा जैसे कार्य सिद्ध३ होते हैं, वैसे ही लीला जैति के मंत्रों से कार्य सिद्ध होते हैं।
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भैरव, भूत, प्रेतादि के आवेश तथा दोष, पाखंड, रोग और वायु४ के प्रकोप आदि सब ही शरीर से हट जाते हैं।
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राघवदासजी कहते हैं- उक्त ग्रंथ के मन्त्रों का नित्य नियमपूर्वक निरन्तर जप किया जाता है तो भगवान् भक्त पर कृपा५ करके उससे ऐसे मिलते हैं, जैसे सेवक के स्वामी से प्रेमपूर्वक मिला करते हैं ॥२५८॥
(क्रमशः)

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