सोमवार, 17 अप्रैल 2023

*३१. पारिख कौ अंग १/४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*३१. पारिख कौ अंग १/४*
.
जगजीवना सुलिक६ दे, सार सबद सों बंधि ।
खोटा नांणा७ दूरि करि, षरा गांठड़ी बंधि ॥१॥
(६. सुलिक=कही हुई बाट) (७. नाणां=सिक्का)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि चाहे शुल्क ही देना पड़े है जीव तत्व को पहचान कर उससे ही बंधे रहो उसी नियम से चलो । खोटा सिक्का परे करके अपने हृदय रुपी गठरी में राम नाम का खरा सिक्का रखें ।
.
जगजीवन कस८ लीजिये, ब्रह्म अग्नि में ताइ९ ।
कंचन है सो ऊबरे, काठ१० सकल जल जाइ ॥२॥
(८. कस=कसौटी, परीक्षा) {९. ताइ=तस(जला) कर} {१०. काठ=दोष(मल, कलंक)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव को ब्रह्म अग्नि में तपा कर ही प्रभु शरण में लेते हैं इसमें जो खरा कंचन है वह तो उबरेगा व पार होगा व जो दोष युक्त होगा वह सब जल जायेगा ।
.
कहि जगजीवन मार तजि, सार संग्रह हरि नांम ।
उतपति परलै तैं बचै, सुमरि सुमरि सब ठांम ॥३॥
जगजीवन जी कहते हैं कि मार यानि संसार के दुःखों को छोड़ और सार रुपी हरि नाम का संग्रह करें । तब ही जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो सकते हैं जब हर समय व स्थान पर हरि स्मरण हो ।
.
कहि जगजीवन रांमजी, एक कोई मांहि एक ।
उतपति परसी आतमां, उपजी मांहि अनेक ॥४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु इस एक देह में भी कोइ एक है । जिसने जन्मकर अंतर में अनेक विचार उत्पन्न कर दिये ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें