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*दादू मंझि सरोवर विमल जल, हंसा केलि करांहि ।*
*मुक्ताहल मुक्ता चुगैं, तिहिं हंसा डर नांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(२)चित्रों का दर्शन*
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श्रीरामकृष्ण अब चित्रों को देखने के लिए उठे । साथ मास्टर हैं तथा कुछ भक्तगण । गृहस्वामी के भ्राता श्रीयुत पशुपति साथ साथ रहकर तस्वीरें दिखा रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण पहले चतुर्भुज विष्णुमूर्ति देख रहे हैं । देखकर ही भावावेश में परिपूर्ण हो गये । खड़े थे, बैठ गये । कुछ काल भावाविष्ट रहे ।
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दूसरा चित्र श्रीरामचन्द्रजी की भक्तवत्सल मूर्ति का है । श्रीराम हनुमान के सिर पर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद दे रहे हैं । हनुमान की दृष्टि श्रीरामचन्द्रजी के पादपद्मों पर लगी हुई है । श्रीरामकृष्ण बड़ी देर तक यह चित्र देखते रहे । भावावेश में कह रहे हैं - "आहा ! आहा !"
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तीसरा चित्र वंशीधर श्रीमदनगोपाल का है । कदम्ब के नीचे खड़े हुए हैं ।
चौथा चित्र वामनावतार का है, छाता लगाये हुए बलि के यज्ञ में जा रहे हैं । श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं - 'वामन', और टकटकी लगाये देख रहे हैं ।
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फिर नृसिंहमूर्ति देखकर श्रीरामकृष्ण गो-चारण देख रहे हैं । श्रीकृष्ण गोपाल बालकों के साथ गौएँ चरा रहे हैं । श्रीवृन्दावन और यमुनापुलिन ! मणि कह उठे, 'बड़ी सुन्दर तस्बीर है !'
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सप्तम चित्र देखकर श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – धूमावती ! 'अष्टम, 'षोडशी'; नवम, 'भुवनेश्वरी'; 'दशम', तारा; एकादश, 'काली' । इन सब मूर्तियों को देखकर श्रीरामकृष्ण कहते हैं - "ये सब उग्र मूर्तियाँ हैं, उन्हें घर में न रखना चाहिए । इन्हें यदि घर पर रखे तो इनकी पूजा करना उचित है, साथ ही भोग भी चढ़ाना चाहिए । परन्तु आप लोगों के भाग्य अच्छे हैं, आप रख सकते हैं ।"
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श्रीअन्नपूर्णा के दर्शन कर श्रीरामकृष्ण भावावेश में कह रहे है - "वाह ! वाह !'
फिर देखा राधिका का राजा-वेश, सखियों के साथ वन में सिंहासन पर बैठी हुई हैं । श्रीकृष्ण द्वार पर कोतवाल बनकर बैठे हुए हैं ।
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फिर झूलना-चित्र । श्रीरामकृष्ण बड़ी देर तक इसके बाद का चित्र देख रहे हैं । ग्लास-केस के भीतर वीणावादिनी का चित्र है । देवी हाथ में वीणा लिये हुए आनन्द से रागिनी अलाप रही हैं ।
तस्वीरों का देखना समाप्त हो गया । श्रीरामकृष्ण फिर गृहस्वामी के पास गये । खड़े हुए गृहस्वामी से कह रहे हैं, "आज बड़ा आनन्द आया । वाह ! आप तो पूरे हिन्दू हैं । अंग्रेजी चित्र न रखकर इन चित्रों को रखा है, यह सचमुच बड़े आश्चर्य की बात है ।"
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श्रीयुत नन्द बसु बैठे हुए हैं, वे श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं - "बैठिये, आप खड़े क्यों हैं ?"
श्रीरामकृष्ण (बैठकर) - ये चित्र काफी बड़े हैं । तुम अच्छे हिन्दू हो ।
नन्द बसु - अंग्रेजी चित्र भी हैं ।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - वे ऐसे नहीं हैं । अंग्रेजी की ओर तुम्हारी वैसी दृष्टि नहीं है ।
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कमरे की दीवार पर श्रीयुत केशचन्द्र सेन के नवविधान की तस्बीर लटकी हुई थी । श्रीयुत सुरेश मित्र ने वह चित्र बनाया था । वे श्रीरामकृष्ण के एक प्रिय भक्त हैं । उस चित्र में दिखाया है कि श्रीरामकृष्ण केशव को दिखा रहे हैं कि भिन्न-भिन्न मार्गों से सब धर्मों के लोग ईश्वर की ही ओर अग्रसर होते जा रहे हैं । गम्यस्थान एक है, केवल मार्ग पृथक्-पृथक् हैं ।
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श्रीरामकृष्ण - वह तो सुरेन्द्र का बनाया हुआ चित्र है ।
प्रसन्न के पिता (हँसकर) - आप भी उसके भीतर हैं ।
श्रीरामकृष्ण - वह एक विशेष ढंग का है, उसके भीतर सब कुछ है - वह आधुनिक भाव का चित्र है ।
यह कहते हुए श्रीरामकृष्ण को एकाएक भावावेश हो रहा है । श्रीरामकृष्ण जगन्माता से वार्तालाप कर रहे हैं ।
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कुछ देर बाद मतवाले की भाँति कह रहे हैं - "मैं बेहोश नहीं हुआ ।" घर की ओर दृष्टि करके कह रहे हैं, "बड़ा मकान, इसमें क्या हैं, - ईंटें, काठ और मिट्टी ।"
कुछ देर बाद उन्होंने कहा, "देव-देवताओं के ये सब चित्र देखकर मुझे बड़ा आनन्द हुआ ।" फिर कहने लगे - "उग्र मूर्ति, काली, तारा(शव और शिवा के बीच श्मशान में रहनेवाली) रखना अच्छा नहीं, रखने पर पूजा चढ़ानी चाहिए ।"
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पशुपति (हँसकर) - वे जितने दिन चलायेंगी, उतने दिन तो चलेगा ही ।
श्रीरामकृष्ण - यह ठीक है । परन्तु ईश्वर में मन रखना अच्छा है, उन्हें भूलकर रहना अच्छा नहीं ।
नन्द बसु - उनमें मति होती कहाँ है ?
श्रीरामकृष्ण - उनकी कृपा होने पर सब हो जाता है ।
नन्द बसु - उनकी कृपा होती कहाँ है ? उनमें कृपा करने की शक्ति भी हो तब न ?
(क्रमशः)
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