बुधवार, 19 अप्रैल 2023

*३१. पारिख कौ अंग ५/८*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*३१. पारिख कौ अंग ५/८*
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कहि जगजीवन रांमजी, देह कहै रस रंग ।
प्राण पवन मन आतमां, सतगुरु राखौ संग ॥५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु देह तो संसारिक सुख के साधन आमोद प्रमोद मांगती है । और जो प्राण है श्वास है मन है आत्म है वे सतगुरु सानिध्य ही मांगते हैं ।
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कहि जगजीवन रांमजी, नजरि खुलै जे मांहि१ ।
हीरा परखै जौहरी, खोटी राखै नांहि ॥६॥
(१. नजरि खुलै जे मांहि=अन्तर्दृष्टि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु जो अंतरदृष्टि मन में ही झांके तो तो फिर नाम रुपी हीरा ही रहै फिर संसार वाला खोट नहीं चलेगा ।
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कहि जगजीवन रांमजी, नजरि२ खुलै सत संग ।
साँच झूंठ समझै तहां, अंग मंहि भेदै अंग ॥७॥
(२. नजरि=ज्ञानचक्षु) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु जब दृष्टि से देखूं तो सत्संग ही अनुभव करुं । तब ही सत्य, असत्य का भेद समझ आयेगा व  फिर ज्ञान चक्षुओं से असत्य भेद कर सत्य को जानेंगें ।
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जगजीवन ऊंची बसत, ढूंढ ढ़ांढि३ घर आंनि ।
रतन पदारथ रांम रस, परम जोति पहचांनि ॥८॥
(३. ढूंढ ढांढि=अत्याधिक खोज कर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो सबसे ऊंची वस्तु प्रभु का ध्यान है उसे भटकने मत दो । ह्रदय रुपी घर में लाकर रखो । जो रामनामरस है वह तो हीरा है उसके तेज को समझो ।
(क्रमशः)

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