गुरुवार, 20 अप्रैल 2023

दरसन कब देषूं१ हो भाई

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*सुरति पुकारै सुन्दरी, अगम अगोचर जाइ ।*
*दादू विरहनी आत्मा, उठ उठ आतुर धाइ ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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राग मलार ॥१२॥
दरसन कब देषूं१ हो भाई ।
नां जांनूं२ वै कहां पधारे, कोई कहै न आई ॥टेक॥
पल पल रती निमष नहिं रहते, अब दिन बरिष गिणाई ।
काली रैंनि काल व्है, आई, कोइ न करै सहाई ॥
मधुर बैंन सुनि सुनि रस पीवत, सो सुष कह्यौ न जाई ।
अब कहुं गोपि रहे३ अपरछन, नष सष दौं प्रजराई ॥
दिन के अरस परस मिलि रहते, बात न गोपि दुराई ।
टीला गुर दादू बिन देषें, हियरौ कहूं न सिराई ॥४८॥
(पाठान्तर :१. देषौं, २. जांनौं, ३. व्है रहे )
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हे भाई ! मैं मेरे प्रियतम गुरुमहाराज दादू के दर्शन कब कर पाऊँगा ? मैं नहीं जानता, वे कहाँ पधार गए हैं । कोई भी उनकी खबर आकर बताता नहीं है ।
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पहले उनके बिना में पल=क्षण भर ही नहीं रहता था किन्तु अब तो उनके बिछोह का एक दिन भी एक वर्ष के समान लगता है ।
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अँधियारी रात्रि काल के समान होकर सामने आती है । उसमें कोई भी सहायता नहीं करता है ।
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मैं पहले गुरुमहाराज के मधुर वचनों को सुन-सुनकर रामरसामृत का पान करता था जिसके सुख का वर्णन करना अशक्य है । अब गुरुमहाराज कहीं पर गुप्त रूप में अप्रकट हो गए हैं जिससे मुझको उनका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं हो रहा है । उनके दर्शन नहीं होने के कारण में नख से लेकर शिखा पर्यन्त विरहाग्नि में जला जा रहा हूँ ।
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दिन में हम अरस-परस=साथ-साथ ही रहते थे; हमारा निमिष मात्र के लिए भी बिछोह नहीं होता था । वे अपने मन की बात मुझसे गुप्त नहीं रखते थे और मैं उनसे नहीं । टीला कहता है, गुरुमहाराज दादू के दर्शन किए बिना हृदय कहीं पर भी कैसे भी शीतल नहीं हो रहा है ॥४८॥
(क्रमशः)

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