शुक्रवार, 21 अप्रैल 2023

*३१. पारिख कौ अंग ९/१२*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*३१. पारिख कौ अंग ९/१२*
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जगजीवन ऊँची बसत४, अति उत्तम हरि नांम ।
दूजी ऊतरती५ सकल, आवै तो किहिं कांम ॥९॥
(४. वसत=वस्तु) (५. ऊतरती=अपेक्षाकृत हीन वस्तु)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सबसे ऊंची वस्तु हरिनाम ही है । दूसरी सभी मूल्य हीन है वे किस काम आयेगी ? अर्थात व्यर्थ है ।
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जगजीवन ऊंची बसत, सकै न कोई जांन ।
सुख सम्पति माया विभै६, हरि बिन दूजी हांन ॥१०॥
(६. विभै=वैभव, लौकिक सम्पत्ति)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो श्रेष्ठ है उसे कोइ जान ही नहीं पाते वह है प्रभुनाम, उसके समक्ष माया, वैभव, सुख सम्पत्ति सब गौण है ।
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(कहि) जगजीवन ऊंची बसत, अति ही ऊंची ठांइ ।
कोई क पावै खोज तन, मन बिलमावै७ नांहि ॥११॥
(७. बिलमावै नांहि=आसक्त न करै)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो प्रभु नाम ऊंची वस्तु है उसे कोइ सहज ही नहीं खोज सकता क्योंकि वह ऊंचे स्थान पर ही रहती है । जो संसार में आसक्ति नहीं रखते वे ही उसे खोज पाते हैं ।
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जगजीवन झूंठ सब, रांम नांम निज सांच ।
एही देखि पटंतरौ८, कहँ कंचन कहँ कांच ॥१२॥
(८. पटंतरौ=भेद)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सब असत्य है सत्य तो केवल प्रभु नाम है यह इस प्रकार से जाने जैसे कांच व कंचन मे भेद है कांच तो मूल्य हीन है जबकि वह भी चमकता है कंचन की भांति जो मूल्यवान है । अतः कंचन होने का प्रयास करें ऐसा संत कहते हैं ।
(क्रमशः)

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