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*विरहनी रौवे रात दिन, झूरै मन ही मांहिं ।*
*दादू औसर चल गया, प्रीतम पाये नाहिं ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग मारू ९(गायन समय युद्ध)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१३८ त्रिताल
सखी सुन कैसे रहिये,
हरि वियोग बिरहत१ तन, का सौ कहु कहियै ॥टेक॥
विरहनि वियोग शोक, रैनि दिवस दहिये२ ।
दीरध दुख देखि देखि, कौन भांति सहिये ॥१॥
विरह पीर नैन नीर, तामें ही बहिये ।
दीसत नहिं सो जहाज, जो बूड़त गहिये ॥२॥
देखो दुख मीन भीन३, जस चातक चहिये ।
जन रज्जब जीवहि क्यों, जीवन नहिं लहिये ॥३॥३॥
✦ संत सखि ! मेरी बित सुनो, मुझे से कैसे रहा जाय ? हरि के वियोग से शरीर पीड़ित१ है । कहो, दु:ख किससे कहूं ।
✦ यह प्रभु वियोग का शोक मुझ विरहनी को रात्रि दिन जला२ रहा है । इस महान दु:ख को देख देख कर व्यथित हूं, किस प्रकार सहन कर सकूंगी ?
✦ मैं विरह पिड़ा द्वारा नेत्रों से निकलने वाले जल प्रवाह में बह जाऊंगी । मुझे वह जहाज भी नहीं दिखाई दे रहा है, जिसे डूबते समय पकड़ सकूं ।
✦ देखो, मेरा दु:ख ऐसा है, जैसे जल से अलग३ होने पर मच्छी को होता है । जैसे चातक पक्षी स्वाति विंदु को चाहता है, वैसे ही मैं प्रभु को चाहती हूं । जब मेरे जीव रूप प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकती हूं तब जीवित क्यों रहूं, कारण - प्रभु वियोग युक्त जीवन दु:ख रूप ही है ।
(क्रमशः)

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