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*माया देखे मन खुशी, हिरदै होइ विकास ।*
*दादू यहु गति जीव की, अंत न पूगै आस ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ माया का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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श्रीरामकृष्ण - ज्ञान के लक्षण हैं । पहला यह कि अभिमान न रह जायेगा । दूसरा, स्वभाव शान्त बना रहेगा । तुममें दोनों लक्षण हैं । अतएव तुम पर ईश्वर का अनुग्रह है ।
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"अधिक ऐश्वर्य के होने पर ईश्वर को लोग भूल जाते हैं, ऐश्वर्य का स्वभाव ही ऐसा है । यदु मल्लिक को बहुत ऐश्वर्य हुआ है, वह आजकल ईश्वर की बात ही नहीं करता । पहले ईश्वर-चर्चा खूब किया करता था ।
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"कामिनी और कांचन एक तरह की शराब है । अधिक शराब पीने पर फिर चाचा और दादा का विचार नहीं रह जाता । उन्हें ही कह डालता है - 'तेरी ऐसी की तैसी ।’ मतवाले को बड़े-छोटे का ज्ञान नहीं रहता ।"
नन्द बसु - हाँ, यह तो ठीक है ।
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पशुपति - ये सब क्या ठीक हैं ? स्पिरिच्युएलिज्म, थियोसफी, सूर्यलोक, नक्षत्रलोक ?
श्रीरामकृष्ण - नहीं भाई, मैं नहीं जानता । इतना हिसाब-किताब क्यों ? आम खाओ । आम के कितने पेड़ हैं, कितनी लाख डालियाँ हैं, कितने करोड़ पत्ते हैं, इसके हिसाब लगाने की क्या जरूरत ? मैं बगीचे में आम खाने के लिए आया करता हूँ, आम खाकर चला जाऊँगा ।
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"एक बार भी अगर चैतन्य हो, अगर एक बार भी ईश्वर को कोई समझ सके, तो दूसरी व्यर्थ बातों के जानने की इच्छा भी नहीं होती । विकार के होने पर लोग बहुत कुछ बका करते हैं - 'अरे ! मैं तो पाँच सेर चावल का भात खाऊँगा, मैं दस घड़ा पिऊँगा रे !' - यह सब । वैद्य कहता है - 'खायेगा ! अच्छा खा लेना - यह कहकर वह तम्बाकू पीने लगता है । विकार अच्छा हो जाने पर, रोगी जो कुछ कहता है उसकी ओर वह ध्यान देता है ।"
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पशुपति - जान पड़ता है, हम लोगों का विकार चिरकाल तक बना रहेगा ।
श्रीरामकृष्ण - क्यों, ईश्वर पर मन रखो, चैतन्य प्राप्त होगा ।
पशुपति (सहास्य) - हम लोगों का ईश्वर से योग क्षणिक है । तम्बाकू पीने में जितनी देर लगती है, बस उतनी ही देर तक । (सब हँसते हैं)
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श्रीरामकृष्ण - तो क्या हुआ, थोड़ी देर के लिए भी उनसे योग हो गया तो मुक्ति होगी ही ।
"अहिल्या ने कहा, 'राम, चाहे शूकर-योनि में जन्म हो, अथवा और कहीं, ऐसा करो कि तुम्हारे श्रीचरणों में मन लगा रहे - शुद्धा भक्ति बनी रहे ।’
(क्रमशः)

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