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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३१३)*
*राग सोरठ ॥१९॥**(गायन समय रात्रि ९ से १२)*
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*३१३. विरह विनती । सुरफाख्ता ताल*
*तूँ आपैं ही विचार, तुझ बिन क्यों रहूँ ?*
*मेरे और न दूजा कोइ, दुःख किसको कहूँ ॥टेक॥*
*मीत हमारा सोइ, आदैं जे पीया ।*
*मुझे मिलावै कोइ, वै जीवन जीया ॥१॥*
*तेरे नैन दिखाइ, जीऊँ जिस आस रे ।*
*सो धन जीवै क्यों, नहीं जिस पास रे ॥२॥*
*पिंजर मांहैं प्राण, तुझ बिन जाइसी ।*
*जन दादू माँगै मान, कब घर आइसी ॥३॥*
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भा०दी०-हे भगवान् ! स्वयमेव विचारं कुरु । अहं भवन्तं विना कथं सुखी भविष्यामि । नान्यस्त्वां विना मे दुःखहर्ता । अत: कस्मै मे दुःखं निवेदयामि । य: संसारस्याद्यन्त: प्रभुरस्ति, स एव मम सुहृदस्ति । स हि मे जीवनाश्रयः । अस्ति कश्चिदेतादृशो महात्मा यस्तेन प्रभुणा सह मे मेलनं कुर्यात् तदा तस्य महात्मन: परमां दयां मन्येऽहम् । हे प्रभो ! मुखनयनादिकं दर्शय, येन मे जीवनाधारो भवेत् । यस्याः स्त्रियाः पतिर्यदि पार्वे न भवेत्तर्हि तस्या नार्या जीवनं कथं भवितुमर्हति । तथैव मम जीवनमपि दुर्लभम् । प्राणपक्षिणस्तु बहिर्गन्तुं त्वरन्ते । अहं भवतां भक्तस्त्वां प्रार्थये । वदतु भवान् कदा मम विनयं स्वीकृत्य हृदय-गृहे तवागमनं भवेत् ।
उक्तं हि भक्ति-रसायने-
हंसस्त्वमित्यभिहितं मुनिभिर्महद्भि- स्तन्मानसे विहरणं तव जन्मसिद्धम् ।
कृष्णस्वरूपभृद पत्रपयेति विद्यो । नेहागतोऽसि बत नः शुभमानसेषु ॥
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हे भगवान् ! आप ही विचार कीजिये कि मैं आपके बिना कैसे सुखी रह सकता हूं? आपके सिवा मेरा दुःख हरने वाला कोई दूसरा है भी नहीं, जिससे मेरा दुःख उसको सुनाऊं । जो संसार के आदि अन्त में रहता है, वह ही मेरा परम मित्र है, वह ही मेरे जीवन का आधार है । ऐसे महात्मा जो मुझे प्रभु से मिला दे, ऐसा कोई हो तो मैं उसकी बहुत बड़ी दया मानूँगी ।
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हे प्रभो ! आप अपने नेत्र, मुख दिखलाइये, जिससे मेरे जीवन का कुछ आधार बन जाय । जिस स्त्री का पति उसके पास न रहे तो उस नारी का जीवन कैसे सुखी हो सकता है ? ऐसे ही आपके दर्शनों के बिना मेरा जीवन भी सुखी नहीं हो सकता, हो सकता है कि जीवन ही न रहे, क्योंकि यह मेरा प्राणपक्षी तो बाहर जाने के लिये जल्दी कर रहा है । इसलिये मैं आपसे प्रार्थना कर रही हूं कि आप मेरे हृदय घर में कब पधारेंगे ?
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भक्तिरसायन में –
आपको ऋषि-महर्षियों ने हंस बतलाया है । अतः आपका मेरे मानसरोवर में विहार करने का जन्म-सिद्ध अधिकार है । परन्तु मैं समझती हूं कि आप हमारे शुभमानस में आने के लिये लज्जित हो रहे हैं कारण कि मैं काला कैसे आऊं, क्योंकि आप कृष्ण स्वरूप हैं । अतः इस लज्जा को त्याग दो और मन-मानसरोवर में पधारो ।
(क्रमशः)

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