रविवार, 9 अप्रैल 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #३१५

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३१५)*
*राग सोरठ ॥१९॥**(गायन समय रात्रि ९ से १२)*
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*३१५. झपताल*
*पीव देखे बिन क्यों रहूँ, जिय तलफैल मेरा ।*
*सब सुख आनन्द पाइये, मुख देखूं तेरा ॥टेक॥*
*पीव बिन कैसा जीवना, मोहि चैन न आवै ।*
*निर्धन ज्यों धन पाइये, जब दरस दिखावै ॥१॥*
*तुम बिन क्यों धीरज धरूं, जो लौं तोहि न पाऊँ ।*
*सन्मुख ह्वै सुख दीजिये, बलिहारी जाऊँ ॥२॥*
*विरह वियोग न सह सकूँ, कायर घट काचा ।*
*पावन परस न पाइये, सुनि साहिब साँच ॥३॥*
*सुनिये मेरी विनती, इब दर्शन दीजे ।*
*दादू देखन पावही, तैसैं कुछ कीजे ॥४॥*
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भादी०- हे प्रभो ! त्वदर्शनं विना कथं शरीरं धारयिष्यामि । अधैर्येण विलपामि । त्वद्दर्शने तु सर्वं सुखं, सांसारिकं तथा परमानन्दञ्च प्राप्स्यामि । प्रियं विना तु मे जीवनं दुःखमयमस्ति । नहि किञ्चिदपि सुखं लभे । धनलाभेन यथा निर्धन: सुखी भवति तथैवाहमपि भवद्दर्शनेन सुखी भविष्यामि । भवद्दर्शनं विना तु मम धैर्यमपि कथं सुरक्षितं भवेत् । अत: प्रादुर्भूय दर्शनेन कृतकृत्यं कुर्यात् । अहं तव चरणारविन्दयोनतमस्तकोऽहम् । नहि वियोगजन्यं विरहदुःखं सोढुं शक्नोमि । शरीरं तु क्षण-भङ्गरं, दर्शनं तु न जाने कदा भविष्यति । न जाने कदाचिद्दर्शनं विनैव शरीरं नश्येत् ।
हे मम स्वामिन्मम प्रार्थनामवधारय, कृपां कृत्वा चरणयोर्दर्शनं देहि ।
कीदृशेनाप्युपायेन भवदर्शनं यथा स्यात्तथा कृपां कुरु ।
उक्तं हि भक्तिरसायने-
सदा संनिहितः श्रीश: स्वीयानामिति संविदः ।
अस्मन्मनः क्षाभवन्ति त्वदागमनवाञ्छया ।
अनेकनति संस्तवे विरचितेऽप्यलं ते पदे ।
सतां सुखपदे दया न समदेति यत् संप्रति ॥
तदद्य विदितं प्रभो निम्विन बीजं जने ।
चिरं खलसमागमो भवति निर्धत्वप्रसू: ॥
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आपके दर्शनों के बिना यह वियोगिनी शरीर को कैसे धारण करेगी ? यदि आपके दर्शन हो जायँ तो मानो मुझे सांसारिक सुख व परमानन्द दोनों ही मिल गये । प्यारे के बिना तो मेरा जीवन ही दुःखमय हो गया, कुछ भी तो सुख नहीं मिला । जैसे निर्धन को धन मिल जाय तो वह बहुत खुश होता है । ऐसे ही यदि आपके दर्शन मिल जायें तो मैं भी बहुत प्रसन्न हो जाऊं । अब आपके दर्शनों के बिना मेरा धैर्य सुरक्षित नहीं रहेगा अर्थात् धैर्य भी नष्ट हो जायगा ।
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अब तो आप प्रकट होकर दर्शन द्वारा कृतकृत्य कीजिये । आपके चरणकमलों में नमस्कार कर रही हूं । अब वियोगजन्य दुःख नहीं सहा जायगा । शरीर भी क्षणभंगुर है, कहीं आपके दर्शनों के बिना ही नहीं चला जाय । हे प्रभो ! मेरी प्रार्थना पर कुछ ध्यान दीजिये और कृपा करके चरणों का दर्शन दीजिये । चाहे कैसा भी उपाय क्यों न करना पड़े, जिससे मेरे को दर्शन हो जायें, ऐसी कृपा कीजिये ।
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भक्तिरसायन में –
भगवान् सदा ही भक्तों के पास रहते हैं, ऐसा शास्त्र कहता है । लेकिन हमारा मन तो आप को प्राप्त करने के लिये दुःखी हो रहा है । अतः ये कैसे मानूं कि भगवान् भक्तों के पास ही रहते हैं ।
आपके चरणारविन्द सन्तों को सुख देने वाले हैं, और अनेक बार मैंने भी उन चरणों में नमस्कार किया है लेकिन फिर भी आपको दया नहीं आती तो आज हमने इसका कारण जान लिया कि आप ने खल(दुष्ट) का संग किया है । दुष्ट के संग से आप में निर्दयाता आ गई, इसीलिये दया नहीं कर रहे हैं ।
(क्रमशः)

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