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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*ब्रह्म गाय त्रि लोक में, साधु अस्तन पान ।*
*मुख मारग अमृत झरै, कत ढूँढै दादू आन ॥*
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*गुर वचन महिमा कौ अंग ॥*
बषनां बाणी बरसणी, बरसै अंमृत धार ।
साध सवाया पूजिये, सो बाणी का उपगार ॥२५॥
बषनांजी कहते हैं, ब्रहमनिष्ठ गुरुमहाराज की वाणी अणभै = आत्मानुभव रूप होती है जो अमृत सदृश उपदेश देती है । इसके विपरीत पंडितों या सामान्य उपदेशकों की वाणी अमृतमय नहीं होती क्योंकि वे वेद पुराणादि के साक्ष्य से अपनी बात कहते हैं, आत्मानुभव के बल पर नहीं । यही कारण है कि इन उपदेशकों की अपेक्षा आत्मनिष्ठ साधु महात्मा संसार में सवाये पूजे जाते हैं । यह भेष का माहात्म्य न होकर वाणी – अणभै = आत्मानुभवयुक्त वाणी का ही होता है ॥२५॥
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*गुर वचन प्रतीति कौ अंग ॥*
बषनां घटि टकसाल व्है, नाणौं घड़िजै सोइ ।
जिहि पाडौ लागै नहीं, गैरी कहै न कोय ॥२६॥
बषनांजी कहते हैं, अतःकरण टकसाल सदृश है जिसमें भक्ति, वैराग्य, ज्ञान आदि के सिक्के ढालने चाहिये । हे मुमुक्षुओं ! ध्यान में लाओ, जिन सिक्कों पर, पाडौ = ठप्पा = मुहर नहीं छपती उन्हें कोई भी शुद्ध सिक्के नहीं कहते । इसी प्रकार जिस अन्तःकरण में भक्ति, वैराग्य, ज्ञान का उदय नहीं होता, उसे कोई भी आत्मजिज्ञासु नहीं कहता ॥२६॥ गैरी के स्थान पर ‘खरी’ पाठान्तर मिलता है । हमने भी गैरी का अर्थ खरा = शुद्ध ही किया है ।
(क्रमशः)

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