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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी. @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३५. किस्तूरिया म्रिग कौ अंग ९/११*
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कहि जगजीवन नाभि घर, सोई रहै सब ठांम ।
गहै लहै मांहैं रहै, जे चित्त राखै रांम ॥९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो नाभि स्थित है उसकी गंध सर्वत्र है । इसी लेन देन सबमें वह ही प्रभु रहे हम सदा उनका चिंतन करें ।
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तेज पुंज आकार मैं, निराकार भरपूर ।
कहि जगजीवन निकट हरि, (पन) अनजाने अति दूर ॥१०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि तेजोमय आकार में परमात्मा की उपस्थिति भरपूर है । संत कहते हैं कि प्रभु बिल्कुल पास है पर उन्हें न जान पाने से वे बहुत दूर भासते हैं ।
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बाहर रहै बाहर कहै, भीतर आवै नांहि ।
कहि जगजीवन जोति करि, जिवै तो जीवन मांहि ॥११॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि उपरी मन से सिमरण करें उपरी मन से राममय रहे। अंतर में बिल्कुल न रहे । संत समझाते हुये कहते हैं कि हे जीव आंतर में ज्ञान ज्योति जगा और वैसा ही जीवन जी जो दिखावे से परे हो ।
(क्रमशः)

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