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*कहूँ कथा कुछ कही न जाई,*
*इक तिल में ले सबै समाइ ॥*
*गुण हु गहीर धीर तन देही,*
*ऐसा समरथ सबै सुहाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ८९)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*वृन्दावन भक्ति रस के रसिक भक्त*
*छप्पय-*
*वृन्दावन को मधुर रस,*
*इन सबहिन मिल चाखियो ।*
*१ भट्ट गोपाल, २ भू भृति,*
*प्रभु मय सर्वस्व देखे ।*
*३ थानेश्वरी जगनाथ,*
*४ विपुल बीठल रस रेखै ॥*
*५ रिषीकेश, ६ भगवान,*
*७ महामुनि मधु, ८ श्रीरंगा ।*
*९ घमंड़ी, १० युगलकिशोर,*
*११ जीव, १२ भूगर्भ उतंगा ॥*
*१३ कृष्णदास, १४ पंडित उथै,*
*हरि-सेवा व्रत राखियो ।*
*वृन्दावन को मधुर रस,*
*इन सबहिन मिल चाखियो ॥२६२॥*
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वृन्दावन के मधुर भक्ति रस का आस्वादन इन महानुभावों ने विचारों द्वारा मिलकर किया था । १. गोपालभट्टजी, २. भूभृतिजी-इन दोनों ने अपना सर्वस्व प्रभु रूप देखते हुये वृन्दावन में भक्ति की थी । ३. थानेश्वरी जगन्नाथजी और ४. विपुल बीठलजी ने रस-रेखा अर्थात् भक्ति रस के स्वरूप में ही मन लगाया था ।
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५. हृषीकेशजी, ६. अलिगभगवानजी, ७. महामुनि मधुगोस्वामीजी, ८. श्रीरंगजी, ९. घमंडीजी, १०. युगलकिशोरजी, ११. जीव गोस्वामीजी, और अति उत्तम १२. भूगर्भजी,
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१३. कृष्णदासजी ब्रह्मचारी और १४. कृष्णदासजी पण्डित(एक पंडित कृष्ण की कथा ग्रन्थ के अन्त में आगे भी आयेगी) इन दोनों ने हरि-सेवा व्रत रखा था अर्थात् प्रति दिन हरि की सेवा पूजा करते थे ॥२६२॥
(क्रमशः)
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