शनिवार, 17 जून 2023

‘बढ़ते जाओ’

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*दादू मिश्री मिश्री कीजिये, मुख मीठा नाहीं ।*
*मीठा तब ही होइगा, छिटकावै माहीं ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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“एक दर्जे के भक्त और हैं । उनका स्वभाव बन्दर के बच्चे की तरह है । बन्दर का बच्चा खुद किसी तरह माँ को पकड़े रहता है । इस दर्जे के लोगों को कुछ कर्तृत्व का विचार रहता है । मुझे तीर्थ करना है, जप-तप करना है, षोडशोपचार पूजा करनी है तब ईश्वर मिलेंगे, - इनका यह भाव है ।”
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“भक्त दोनों हैं । (भक्तों से) जितना ही बढ़ोगे, उतना ही देखोगे, वे ही सब कुछ हुए हैं - वे ही सब कुछ करते हैं । वे ही गुरु हैं और वे ही इष्ट भी हैं । वे ही ज्ञान और भक्ति सब दे रहे हैं ।
“जितना हो आगे बढ़ोगे उतना ही अधिक पाओगे । देखोगे, चन्दन की लकड़ी फिर आगे और भी बहुत कुछ है - चाँदी सोने की खान, हीरे और मणि की खान; इसीलिए कहता हूँ, ‘आगे बढ़ते जाओ ।’
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“और ‘बढ़ते जाओ’ यह बात भी किस तरह कहूँ ? संसारी आदमी अगर अधिक बढ़ जायँ तो घर और गृहस्थी सब साफ हो जाय । केशव सेन उपासना कर रहा था, कहा, ‘हे ईश्वर, ऐसा करो जिससे तुम्हारी भक्ति की नदी में हम डूब जायँ ।’ जब उपासना समाप्त हो गयी तब मैंने कहा, ‘क्यों जी, तुम भक्ति की नदी में डूब कैसे जाओगे ? डूब जाओगे तो जो चिक के भीतर बैठी हुई हैं, उनकी क्या दशा होगी ? एक काम करो - कभी कभी डूब जाना और कभी कभी निकलकर फिर किनारे पर सूखे में आ जाना ।’ ” (सब हँसते हैं)
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कटोवा के वैष्णव तर्क कर रहे थे । श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं - "तुम कलकलाना छोड़ो । घी जब तक कच्चा रहता है तभी तक कलकलाया करता है ।
“एक बार उनका आनन्द मिलने से विचार- बुद्धि दूर हो जाती है । जब मधु-पान का आनन्द मिलने लगता है तो गूँजना बन्द हो जाता है ।
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“किताब पढ़कर कुछ बातों के कह सकने से क्या होगा ? पण्डित कितने ही श्लोक कहते हैं – ‘शीर्णा गोकुलमण्डली’ आदि सब ।
“ ‘भंग-भंग' रटते रहने से क्या होगा ? उसकी कुल्ली करने से भी कुछ न होगा । पेट में पड़ना चाहिए - नशा तभी होगा । निर्जन में और एकान्त में व्याकुल होकर ईश्वर को बिना पुकारे इन सब बातों की धारणा कोई कर नहीं सकता ।”
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डाक्टर राखाल श्रीरामकृष्ण को देखने के लिए आये हैं । श्रीरामकृष्ण व्यस्त भाव से कह रहे हैं – “आइये, बैठिये ।”
वैष्णव से बातचीत होने लगी ।
श्रीरामकृष्ण - मनुष्य और 'मन- होश' । जिसे चैतन्य हुआ है, वह 'मन होश' है । बिना चैतन्य के मनुष्य-जन्म वृथा है ।
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“हमारे देश(कामारपुकुर) में मोटे पेट और बड़ी बड़ी मूछोंवाले आदमी बहुत हैं; फिर भी वहाँ के लोग दस कोस से अच्छे आदमी को पालकी पर चढ़ाकर क्यों ले आते हैं ? - उन्हें धार्मिक और सत्यवादी देखकर; वे झगड़े का फैसला कर देंगे, इसलिए । जो लोग केवल पण्डित हैं, उन्हें नहीं लाते ।
“सत्य बोलना कलिकाल की तपस्या है । सत्य वचन, ईश्वर पर निर्भरता तथा पर-स्त्री को माता के समान देखना - ये सब ईश्वर दर्शन के उपाय हैं ।”
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श्रीरामकृष्ण बच्चे की तरह डाक्टर से कह रहे हैं – “भाई, इसे अच्छा कर दो ।”
डाक्टर - मैं अच्छा करूँगा ?
श्रीरामकृष्ण (हंसकर) - डाक्टर नारायण है । मैं सब मानता हूँ ।
“अगर कहो - सब नारायण हैं, तो चुप मारकर क्यों नहीं रहते ? - तो उत्तर यह है कि मैं महावत नारायण को भी मानता हूँ ।
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“शुद्ध मन और शुद्ध आत्मा एक ही वस्तु है ।
"शुद्ध मन में जो बात पैदा होती है वह उन्हीं की वाणी है । ‘महावत नारायण’ वे ही हैं ।
“उनकी बात फिर क्यों न मानूँ ? वे ही कर्ता हैं । ‘मैं’ को जब तक उन्होंने रखा है, तब तक उनकी आज्ञा को सुनकर काम करूँगा ।”
अब डाक्टर श्रीरामकृष्ण के गले की बीमारी की परीक्षा करेंगे । श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – “महेन्द्र सरकार ने जीभ दबायी थी - जैसे बैल की जीभ दबायी जाती है !”
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श्रीरामकृष्ण बालक की तरह बार-बार डाक्टर के कुर्ते में हाथ लगाते हुए कह हैं – “भाई ! तुम इसे अच्छा कर दो ।”
Laryngoscope (गला देखने का आईना) को देखकर श्रीरामकृष्ण हँसते हुए कह रहे हैं – “इसमें छाया पड़ेगी, समझ गया ।”
नरेन्द्र ने गाया । परन्तु श्रीरामकृष्ण की बीमारी के कारण अधिक संगीत नहीं हुआ ।
(क्रमशः)

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